परमात्मा है या नहि?

” ‘मैं नहीं देखता कि कहीं कोई परमात्मा है जिसने दुनिया को बनाया’| ‘मैं निश्चित ही अस्तित्व में भगवत्ता का गुण महसूस करता हूं’, ‘लेकिन यह गुण है’, ‘न कि व्यक्ति’| ‘यह प्रेम जैसा अधिक है’, ‘मौन जैसा’, ‘आनंद जैसा’ — ‘व्यक्ति जैसा कम’| ‘तुम कभी किसी परमात्मा से नहीं मिल पाओगे’ ‘उसे ‘हलो’नहीं कह पाओगे’, ‘आप कैसे हैं’ ‘नहीं कह पाओगे कि मैं आपके लिए हजारों सालों से इंतजार कर रहा था’; ‘आप कहां छिपे हुए थे?’
‘परमात्मा व्यक्ति नहीं है’ ‘बल्कि उपस्थिति मात्र है’| ‘और जब मैं “उपस्थिति” कहता हूं’, ‘बहुत सजग होओ क्योंकि तुम अपने संस्कारों के अनुसार सुन सकते हो’| ‘तुम “उपस्थिति” को भी कुछ पदार्थ बना दोगे’ — ‘तुम फिर उसी फंदे में गिर जाओगे’| ‘तुम्हारी चेतना की गहनतम उपस्थिति परमात्मा है’ : ‘यह तुम्हारी अपनीउपस्थिति है’| ‘यह किसी दूसरे से मिलना नहीं है’| ”
ஜ۩۞۩ஜ ॐॐॐ ओशो ॐॐॐ ஜ۩۞۩ஜ

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