“प्रत्येक व्यक्ति बाइ – सेक्सुअल है!: प्रतीक्षारत मन याने स्त्रैण मन” ~ओशो

“प्रत्येक व्यक्ति बाइ – सेक्सुअल है!: प्रतीक्षारत मन याने स्त्रैण मन” ~ओशो
” स्त्री से अर्थ है स्त्रैण। औरजब मैं कहता हूँ, स्त्री से अर्थ है स्त्रैण, तो उसका अर्थ यह है कि पुरुषों में भी ऐसे व्यक्ति हैं, जो स्त्री जैसे हैं, स्त्रैणहैं; स्त्रियों में भी ऐसे व्यक्ति हैं, जो पुरुष जैसे हैं, पौरुषेय हैं। पुरुष और स्त्री केप्रतीक हैं, सिंबालिक हैं। उनके अर्थ को हम ठीक से समझ लें।
गुह्म विज्ञान में, आत्मा की खोज में जो चल रहे हैं, उनके लिए स्त्रैण से अर्थ है ऐसा व्यक्तित्व, जो कुछ भी करने में समर्थ नहीं है; जो प्रतीक्षा कर सकता है, लेकिन यात्रा नहीं कर सकता; जो राह देख सकता है, लेकिन खोज नहीं कर सकता। इसे स्त्रैण कहने का कारण है।
स्त्री और पुरुष का जो संबंध है, उसमें खोज पुरुष कहता है, स्त्री केवल प्रतीक्षा करती है। पहल भी पुरुष करता है, स्त्री केवल बाट जोहती है। प्रेम में भी स्त्री प्रतीक्षा करती है, राह देखती है। और अगर कभी स्त्री प्रेम मेंपहल करे, इनिशिएटिव ले, तो आक्रमकमालूम होगी, बेशर्म मालूम होगी। और अगर पुरुष प्रतीक्षा करे, पहल न कर सके, तो स्त्रैण मालूम होगा।
लेकिन विगत पाँच हजार वर्षों में, गीता के बात, सिर्फ आधुनिक युग में कार्ल गुस्ताव जुंग ने स्त्री और पुरुष के इस मानसिक भेद को समझने की गहरी चेष्टा की है। जुंग ने इधर इन बीस-पच्चीस पिछले वर्षों में एक अभूतपूर्व बात सिद्ध की है, और वह यह कि कोई भी पुरुष पूरा नहीं है और कोई भी स्त्री पूरी स्त्री नहीं है। और हमारा अब तक जो खयाल रहा है कि हरव्यक्ति एक सेक्स से संबंधित है, वह गलत है।
प्रत्येक व्यक्ति बाइ-सेक्सुअल है, दोनों यौन प्रत्येक व्यक्ति में मौजूद है। जिसे हम पुरुष कहते हैं, उसमें पुरुष यौन की मात्रा अधिक है, स्त्री यौन की मात्रा कम है। ऐसा समझें कि वह साठ प्रतिशत पुरुष है और चालीस प्रतिशत स्त्री है। जिसे हम स्त्री कहते है
लेकिन ऐसा कोई भी पुरुष खोजना संभव नहीं है, जो सौ प्रतिशत पुरुष हो और ऐसी कोई स्त्री खोजना संभव नहीं है, जो सौ प्रतिशत स्त्री हो। यह है भी उचित। क्योंकि प्रत्येक व्यक्तिका जन्म स्त्री और पुरुष से मिलकर होता है। इसलिए दोनों ही उसके भीतर प्रवेश कर जाते हैं। चाहे स्त्री के जन्म हो, चाहे पुरुष का जन्म हो, दोनों के जन्म के लिए स्त्री और पुरुष का मिलन अनिवार्य है! और स्त्री-पुरुष दोनों के ही कणों से मिलकर, जीवाणुओं से मिलकर व्यक्ति का जन्म होता है। दोनों प्रवेश कर जाते हैं। जो फर्क है, वह मात्रा का होता है। जो फर्क है, वह निरपेक्ष नहीं, सापेक्ष है।
इसका अर्थ यह हुआ कि जो व्यक्ति ऊपर से पुरुष दिखाई पड़ता है, उसके भीतर भी कुछ प्रतिशत मात्रास्त्री की छिपी है, जो स्त्री दिखाई पड़ती है, उसके भीतर भी कुछमात्रा पुरुष की छिपी होती है। और इसलिए ऐसा भी हो सकता है कि किन्हीं क्षणों में पुरुष स्त्री जैसा व्यवहार करे। ऐसा भीहो सकता है कि किन्हीं क्षणों में जो भीतर है, वह ऊपर आ जाए और जो ऊपर है, नीचे चला जाए।
आप पर एकदम से हमला हो जाए, घर में आग लग जाए, तो आप कितने ही बहादुर व्यक्ति हों, एक क्षण में अचानक आप पाएँगे, आप स्त्री जैसा व्यवहार कर रहे हैं। रो रहे हैं, बाल नोंच रहे हैं, चिल्ला रहे हैं, घबड़ा रहे हैं! अगर माँ के बच्चे पर हमला हो जाए, तो माँ खूँखार हो जाएगी, और ऐसा व्यवहार करेगी, इतना कठोर, इतना हिंसात्मक, जैसा कि पुरुष भी न करपाए। यह संभावना है, क्योंकि भीतर एक मात्रा निरंतर छिपी हुई है। वह किसी भी क्षण प्रकट हो सकती है।
स्त्रैण से अर्थ है, ऐसा मान, जो कुछ भी करने में समर्थ नहीं है; ज्यादा से ज्यादा समर्पण कर सकताहै; ग्राहक मन, प्रतीक्षा मन, रिसेप्टिविटी, द्वार खोलकर प्रतीक्षा कर सकता है।
अगर स्त्री के मन को ठीक से समझें, तो वह किसी ऐसे प्रतीक मेंप्रकट होगा, द्वार खोलकर दरवाजे पर बैठी हुई, किसी की प्रतीक्षा में रत; खोज में चली गई नहीं, प्रतीक्षा में। और पुरुष अगर दरवाजा खोलकर और किसी की प्रतीक्षा करते दीवाल से टिककर बैठा हो, तो हमें शक होगा कि वह पुरुष कम है। उसे खोज पर जाना चाहिए।
जिसकी प्रतीक्षा है, उसे खोजना पड़ेगा, यह पुरुष चित्त का लक्षण है। जिसकी खोज है, उसकी प्रतीक्षा करनी होगी, यह स्त्री चित्त का लक्षण है। स्त्री और पुरुष से इसका कोई संबंध नहीं। ”
ஜ۩۞۩ஜ ॐॐॐ ओशो ॐॐॐ ஜ۩۞۩ஜ
साभार : ‘गीता दर्शन’ प्रवचनमाला से अंश
सौजन्य : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन

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