मनुष्य का मन सेक्स के आस – पास ही घूमता है |

” वह Frayed ठीक कहता है की मनुष्य का मन सेक्स के आस – पास ही घूमता है | लेकिन वह यह गलत कहता है की सेक्स बहूत महत्त्वपूर्ण है इसलिए घूमता है| नहीं, घुमने का कारण है वर्जना, इनकार, विरोध, निषेध | घुमने का कारण है – हजारो साल की परंपरा ; सेक्स को टैबू , वर्जित, निन्दित, गर्हित सिद्ध करने वाली परंपरा |सेक्स को इतना महत्त्वपूर्ण बनाने वालो में साधू – संतो, महात्माओ का हाथ है उन्होंने तख्तिय लटकाई वर्जना की |
यह बड़ा उलटा मालूम पड़ेगा, लेकिन यही सत्य है और कहना ज़रूरी है ! मनुष्य जाती को सेक्सुअलिटी की, कामुकता की तरफ ले जाने का काम महात्माओ ने ही किया है | जितने जोर से वर्जना लगाई है उन्होंने, आदमी उतने जोर से आतुर होकर भागने लगा है | इधर वर्जना लगा दी है | उसका परिणाम यह हुआ है की सेक्स रग – रग से फूट कर निकल पड़ा है | कविता — थोड़ी खोज – बिन करो, ऊपर की राख हटाओ – भीतर सेक्स मिलेगा | चित्र देखो, मूर्ती देखो, सिनेमा देखो……. और साधू – संत इस वक़्त सिनेमा के बहूत खिलाफ है | और उन्हें पता नहीं की सिनेमा नहीं था तो भी आदमी यही करता था कालिदास के ग्रन्थ पढो ! कोई फिल्म इतनी अश्लील नहीं बन सकती जितने कालिदास के वचन है | उठा करदेखो पुराना साहित्य, पुराणी मुर्तिया देखो, पुराने मंदिर देखो | जो फिल्म में है, वह पत्थरों में खुदा मिलेगा | लेकिनआँख नहीं खुलती हमारी | अंधे की तरह पीटते चले जाते है लकीरों को|
सेक्स जब तक दमन किया जायेगा और जब तक स्वस्थ खुले आकाश में उसकीबात न होगी और जब तक एक – एक बच्चे के मन से वर्जना की तख्ती नहीं हटेगी, तब तक दुनिया सेक्स के Obcession से मुक्त नहीं हो सकती है, तब तक सेक्स एक रोग की तरह आदमी को पकडे रहेगा | ”
ஜ۩۞۩ஜ ॐॐॐ ओशो ॐॐॐ ஜ۩۞۩ஜ
~ ” सम्भोग से समाधी की ओर : जीवनउर्जा रूपांतरण का विज्ञानं ” ( प्रवचन #7 से )

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