Category Archives: ઓશો

” कर्म का नियम ” ~ ओशो : –

” कर्म का नियम ” ~ ओशो : – ” कर्म का नियम , पहले तो, नियम हीनहीं है। वह शब्द उसे इस तरह की गंध देता है जैसे वह कुछ वैज्ञानिक हो , गुरुत्वाकर्षण केनियम की तरह। वह सिर्फ एक आशा है, नियम तो जरा भी नहीं है।सदियों तक यह आशा की गई है …

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” साप्ताहिक ध्यान : माँ के गर्भ जैसी शांति पायें ” ~ ओशो : –

” साप्ताहिक ध्यान : माँ के गर्भ जैसी शांति पायें ” ~ ओशो : – ” जब भी तुम्हारे पास समय हो, बस मौन में निढाल हो जाओ, और मेरा अभिप्राय ठीक यही है-निढाल, मानोकि तुम एक छोटे बच्चे हो अपनी मा के गर्भ में….. फर्श पर अपने घुटनों के बल बैठ जाओ और धीरे-धीरे …

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” ईशावास्य उपनिषद : वे ही भोग पाते हैं, जो त्याग पाते हैं! ” ~ओशो : –

” ईशावास्य उपनिषद : वे ही भोग पाते हैं, जो त्याग पाते हैं! ” ~ओशो : – ” इस जगत में, इस जीवन में छोड़नेके लिए जो जितना राजी है, उतना हीउसे मिलता है। पैराडाक्सिकल है। लेकिन जीवन के सभी नियम पैराडाक्सिकल हैं। जीवन के सभी नियम बड़े विरोधाभासी हैं। विरोधी नहीं हैं, विरोधाभासी हैं। …

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” शिक्षा में क्रांति : सफलता कोई मूल्य नहीं है ” ~ ओशो : –

” शिक्षा में क्रांति : सफलता कोई मूल्य नहीं है ” ~ ओशो : – ” मैं जब पढ़ता था तो वे कहते थे कि पढ़ोगे लिखोगे होगे नवाब, तुमको नवाब बना देंगे, तुमको तहसीलदार बनाएंगे। तुम राष्ट्रपति हो जाओगे। ये प्रलोभन हैं और ये प्रलोभन हम छोटे-छोटे बच्चों के मन में जगाते हैं। हमने …

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” शिक्षा में क्रांति : मनुष्य को स्वतंत्र विचार सिखाया जाए “~ ओशो : –

” शिक्षा में क्रांति : मनुष्य को स्वतंत्र विचार सिखाया जाए “~ ओशो : – ” शिक्षक के माध्यम से मनुष्य केचित्त को परतंत्रताओं की अत्यंत सूक्ष्म जंजीरों में बांधा जाता रहा है। यह सूक्ष्म शोषण बहुत पुराना है। शोषण के अनेक कारण हैं-धर्म हैं, ध ार्मिक गुरु हैं, राजतंत्र हैं, समाज के न्यस्त स्वार्थ …

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मनुष्य का मन सेक्स के आस – पास ही घूमता है |

” वह Frayed ठीक कहता है की मनुष्य का मन सेक्स के आस – पास ही घूमता है | लेकिन वह यह गलत कहता है की सेक्स बहूत महत्त्वपूर्ण है इसलिए घूमता है| नहीं, घुमने का कारण है वर्जना, इनकार, विरोध, निषेध | घुमने का कारण है – हजारो साल की परंपरा ; सेक्स को …

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” शास्त्रों में लिखे होने से कुछ कैसे सत्य हो जायेगा? “

” शास्त्रों में लिखे होने से कुछ कैसे सत्य हो जायेगा? सत्य का शास्त्रों से क्या सम्बन्ध? असल में सभी शास्त्रों की आड़ में तुम सत्य की खोज से बचाना चाहते हो, बुद्ध के पास लोग जाते और कहते कि वेदों में तो ऐसा लिखा है और आप कुछ और ही कहते हैं तो बुद्ध …

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” गुरु होश में लाता है ” ~ ओशो : –

” गुरु होश में लाता है ” ~ ओशो : – ” गुरु का एक ही अर्थ हैः तुम्हारी नींद को तोड़ देना। तुम्हें जगा दे, तुम्हारे सपने बिखर जाएं, तुम होश से भर जाओ नींद बहुत गहरी है। शायद नींद कहना भी ठीक नहीं, बेहोशी है। कितना ही पुकारो, नींद के परदे केपार आवाज …

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” सृजनात्‍मकता ही प्रेम है, धर्म है ” ~ ओशो : -“

” सृजनात्‍मकता ही प्रेम है, धर्म है ” ~ ओशो : – ” एक महान सम्राट अपने घोड़े पर बैठ कर हर दिन सुबह शहर में घूमता था। यह सुंदर अनुभव था कि कैसे शहर विकसित हो रहा है, कैसे उसकी राजधानी अधिक से अधिक सुंदरहो रही है। उसका सपना था कि उसे पृथ्‍वी की …

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” मनुष्य की चेतना भीतर से कब स्वस्थ होती है? ” ~ ओशो : –

” मनुष्य की चेतना भीतर से कब स्वस्थ होती है? ” ~ ओशो : – ” ध्यान का पहला अर्थ है कि हम अपने शरीर और स्वयं के प्रति जागना शुरु करें। यह जागरण अगर बढ़ सके तो आपका मृत्यु-भय क्षीण हो जाता है। और जो चिकित्सा-शास्त् र मनुष्य को मृत्यु के भय से मुक्त …

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