” सृजनात्‍मकता ही प्रेम है, धर्म है ” ~ ओशो : -“

” सृजनात्‍मकता ही प्रेम है, धर्म है ” ~ ओशो : –
” एक महान सम्राट अपने घोड़े पर बैठ कर हर दिन सुबह शहर में घूमता था। यह सुंदर अनुभव था कि कैसे शहर विकसित हो रहा है, कैसे उसकी राजधानी अधिक से अधिक सुंदरहो रही है।
उसका सपना था कि उसे पृथ्‍वी की सबसे सुंदर जगह बनाया जाए। वह हमेशा अपने घोड़े को रोकता और एकबूढ़े व्‍यक्‍ति को देखता, वह एक सौ बीस साल का बूढ़ा रहा होगा जो बग़ीचे में काम करता रहता, बीज बोता, वृक्षों को पानी देता—ऐसे वृक्ष जिनको बड़ा होने में सैंकड़ो साल लगेंगे। ऐसे वृक्ष जो चार हजार साल जीते है।
उसे बड़ी हैरानी होती: यह आदमी आधा कब्र में जा चुका है; किनके लिए यह बीज बो रहा है? वह कभी भी इन पर आये फूल और फलों को नहीं देख पायेगा। इसकी कल्‍पना भी नहीं की जा सकती। कि वह अपनी मेहनत का फल देख पायेगा।
एक दिन वह अपने आपको रोक नहीं पाया। वह घोड़े से उतरा और उस बूढ़े व्‍यक्‍ति के पास जाकर उससे पूछने लगा: मैं हर दिन यहां से गुजरता हूं, और एक प्रश्‍न मेरे दिमाग में रोज आता है, अब यहलगभग असंभव हो गया कि मैं आपके कार्य को क्षण भर के लिए बाधा पहूंचाऊंगा। मैं जानना चाहता हूं कि आप किनके लिए ये बीज बो रहे है, ये वृक्ष तब तैयार होंगे,युवा होंगे, जब आप यहां नहीं होंगे।
बूढे व्‍यक्‍ति ने सम्राट की तरफदेखा और हंसा। फिर बोला; ‘’यदि यही तर्क मेरे बापदादाओं का होतातो मैं फल और फूलों से भरे इस सुंदर बग़ीचे से महरूम रह गया होता। हम पीढ़ी दर पीढ़ी माली है—मेरे पिता और बापदादाओं ने बीज बोए, मैं फल खा रहा हूं, मेरे बच्‍चों का क्‍या होगा? मेरे बच्‍चों के बच्‍चों का क्‍या होगा। यदि उनका भी विचार आप जैसाही होता तो यहां कोई बग़ीचा नहींहोता। लोग दूर-दूर से इस बग़ीचे को देखने आते है क्‍योंकि मेरे पास ऐसे वृक्ष है जो हजारों साल पुराने है। मैं बस वही कर रहा हूं जो मैं कृतज्ञता से कर सकता हूं।
‘’और जहां तक बात बीज बोने की है……जब बसंत आता है, हर पत्‍ते को उगते देख कर मुझे इतना आनंद आता है कि मैं भूल ही जाता हूं किमैं कितना बूढ़ा हूं। मैं उतना ही युवा हूं जितना कभी था। मैं युवा बना रहा क्‍योंकि मैं सतत सृजनात्‍मक बना रहा हूं। मैं उतना ही युवा हूं जितना कभी था। शायद इस लिए मैं इतना लंबा जीया, और मैं अब भी युवा हूं, ऐसा लगता है कि मृत्‍यु मेरे प्रति करणावान है क्‍योंकि मैं अस्‍तित्‍व के साथ चल रहा हूं। असतीत्व को मेरी कमी खुलेगी; अस्‍तित्‍व किसी दूसरे को मेरे स्‍थान पर नहीं ला पाएगा। शायद इसीलिए मैं अब भी जिंदा हूं। लेकिन आप युवा है और आप ऐसे प्रश्‍न पूछ रहे है जैसे कि कोई मर रहा हो। कारण यह है कि आप सृजनात्मक है।‘’
जीवन को प्रेम का एकमात्र ढंग हैकि और अधिक जीवन का सृजन का सृजन करो, जीवन को और सुंदर बनाओ अधिक फलदार अधिक रसपूर्ण1 इसके पहले इस पृथ्‍वी को मत छोड़ो जब तक कि तुम इसे थोड़ा अधिक सुंदर न बना दो, जैसा इसे तुमने अपने जन्‍म केसमय देखा था—यही एकमात्र धर्म है जो मैं जानता हूं। बाकी सारे धर्म नकली है।
मैं तुम्‍हें सृजनात्‍मकता का धर्म सिखाता हूं। और अधिक जीवन के सृजन करने से तुम रूपांतरित होओगे क्‍योंकि जो जीवन का निर्माण कर सकता है वह पहले ही परमात्‍मा का, भगवान का हिस्‍सा हो गया। ”
ஜ۩۞۩ஜ ॐॐॐ ओशो ॐॐॐ ஜ۩۞۩ஜ

” मनुष्य की चेतना भीतर से कब स्वस्थ होती है? ” ~ ओशो : –

” मनुष्य की चेतना भीतर से कब स्वस्थ होती है? ” ~ ओशो : –
” ध्यान का पहला अर्थ है कि हम अपने शरीर और स्वयं के प्रति जागना शुरु करें। यह जागरण अगर बढ़ सके तो आपका मृत्यु-भय क्षीण हो जाता है। और जो चिकित्सा-शास्त् र मनुष्य को मृत्यु के भय से मुक्त नहीं कर सकता, वह चिकित्सा-शास्त् र मनुष्य नाम कीबीमारी को कभी भी स्वस्थ नहीं करसकता….. ”
” उसे भीतर की चेतना का अहसास शुरु हो जाए, भीतर की चेतना की फीलिंग शुरु हो जाए।
हमें आमतौर से भीतर की कोई फीलिंग नहीं होती। हमारी सब फीलिंग शरीर की होती है – हाथ की होती है, पैर की होती है, सिर की होती है, ह्दय की होती है। उसकी नहीं होती जो मैं हूं। हमारा सारा बोध, हमारा सारी अवेयरनेस घर की होती है, घर में रहने वाले मालिक की नहीं होती। यह बड़ी खतरनाक स्थिति है। क्योंकि कल अगर मकान गिरने लगेगा, तो मैं समझूंगा – मैं गिर रहा हूं। वही मेरी बीमारी बनेगी।
नहीं, अगर मैं यह भी जान लूं कि मैं मकान से अलग हूं, मकान के भीतर हूं, मकान गिर भी जाएगा, फिरभी मैं हो सकता हूं; तो बहुत फर्कपड़ेगा, बहुत बुनियादी फर्क पड़ जाएगा। तब मृत्यु का भय क्षीण होजाएगा।
ध्यान के अतिरिक्त मृत्यु का भय कभी भी नहीं काटता।
तो ध्यान का पहला अर्थ हैः अवेयरनेस ऑफ वनसेल्फ।
हम सदा, जब भी होश में हैं, तो हमारा होश जो है वह अवेयरनेस अबाउट, किसी चीज के बाबत है सदा। वह कभी अपने बाबत नहीं है। इसीलिए तो हम अकेले बैठें तो हमको नींद आनी शुरू हो जाती है, क्योंकि वहां क्या करे ? अखबार पढ़े, रेडियो खोलें, तो थोड़ा जागनासा मालूम पड़ता है। अगर एक आदमी को हम बिलकुल अकेले में छोड़ दें, अंधेरा कर दें कमरे में…। अंधेरे में इसीलिए नींद आ जाती है आपको, क्योंकि कुछ दिखाई नहीं पड़ता, तो चेतना की कोई जरूरत नहींरह जाती। कुछ चीज दिखायी पड़ती नहीं, तो अब क्या करे, सिवाय सोनेके कोई उपाय नहीं मालूम पड़ता। अकेले पड़ जाएं, अंधेरा हो, कोई बात करने को न हो, कुछ सोचने को न हो, तो बस आप गए नींद में। और कोई उपाय नहीं है।
ध्यान रहे, नींद और ध्यान एक अर्थमें समान हैं, एक अर्थ में भिन्न।नींद का मतलब है: आप अकेले हैं; लेकिन सो गए हैं। ध्यान का मतलब हैः आप अकेले है लेकिन जागे हुए है। बस इतना ही फर्क है। अगर आप अपने अकेलेपन में और अपने भीतर जाग सकते है अपने प्रति…
एक आदमी बुद्ध के सामने बैठा है एक दिन और अपने पैर का अंगूठा हिला रहा है। बुद्ध ने कहा कि अंगूठा क्यों हिलाते हो ?
उस आदमी ने कहा, छोड़िए! ऐसे ही हिलता था, मुझे पता न था।
बुद्ध ने कहा, तुम्हारा अंगूठा हिले और तुम्हें पता न हो! अंगूठा किसका है यह! तुम्हारा हीहै ?
उसने कहा, मेरा ही है। लेकिन आप भी कहां की बातें कर रहे हैं! आप जो बात करते थे जारी रखिए।
बुद्ध ने कहा, वह मैं नहीं करूंगाअब, क्योंकि जिस आदमी से मैं बात कर रहा हूं, वह बेहोश है। पता नहीं तुम मेरा सुन भी रहे हो कि नही…
उसने कहा कि आप भी कैसी बातें कर रहे हैं! अंगूठा हिल रहा है…..
बुद्ध ने कहा, तो अपने अंगूठे के हिलने का आगे से होश रखो। तो उससे दोहरा होश….जो होश में है अंगूठे के प्रति, उसका होश भी पैदा हो जाएगा।
अवेयरनेस इज़ आलवेज डबल एरोड। अगरहम उसका प्रयोग करें तो उसका एक तीर तो बाहर की तरफ रह जाएगा और दूसरा तीर भीतर की तरफ हो जाएगा।
तो ध्यान का पहला अर्थ है कि हम अपने शरीर और स्वयं के प्रति जागना शुरू करें। यह जागरण अगर बढ़ सके तो आपका मृत्यु-भय क्षीण हो जाता है। और जो चिकित्सा-शास्त् र मनुष्य को मृत्यु के भय से मुक्त नहीं कर सकता, वह चिकित्सा-शास्त् र मनुष्य नाम कीबीमारी को कभी भी स्वस्थ नहीं करसकता। हां, चिकित्सा-शास्त् र कोशिश करता है। वह कोशिश करता हैउम्र लंबी करके। उम्र लंबी करने से सिर्फ मृत्यु की प्रतीक्षा लंबी होती है, और कोई फर्क नहीं पड़ता। और लंबी प्रतीक्षा से छोटीप्रतीक्षा अच्छी है। उम्र लंबी करने से सिर्फ मौत और भी दुखदायीहोती चली जाती है।
क्या आपको अंदाज है कि जिन मुल्कों में चिकित्सा-शास्त् र ने लोगों की उम्र ज्यादा बढ़ा दी है, वहां एक नया आंदोलन चल रहा है, वह है अथनासिया का। वह यह है कि बूढ़े कह रहे हैं कि हमें मरने का अधिकार होना चाहिए संविधान में। क्योंकि आप हमको लटकाए चले जा रहे हैं और हमको अब जिंदा रहना बहुत कठिन हो गया। आप तो लटका सकते हैं। एक आदमी को आक्सीजन का सिलेंडर रख कर न मालूम कितनी देर तक लटका सकते हैऔर उसको जिंदा रख सकते हैं। लेकिन उसकी जिंदगी मरने से बदतर हो जाएगी।
अब न मालूम कितने लोग यूरोप और अमेरिका के अस्पतालों में उलटे-सीधे शीर्षासन की हालत मे आक्सीजन के सिलेंडरो से बंधे हुएपड़े है! उनको मरने का हक नहीं है!वे मरने के हक की मांग कर रहे हैं। मैं मानता हू कि आने वाले, इस सदी के पूरे होते-होते दुनियाके सी सुशिक्षित राष्ट्रों के संविधान में जन्मसिद्ध अधिकारोंमें मरने का अधिकार जुड़ जाएगा। क्योंकि चिकित्सक को यह हक नहीं हो सकता कि वह किसी आदमी को उसकी इच्छा के विपरीत जिंदा रखे। अब तक तो हक यह नहीं था कि उसकी इच्छा के विपरीत मारे। लेकिन अभीतक जिंदा रखने का उपाय नहीं था। अब है।
आदमी की उम्र बढ़ाने से मृत्यु काभय कम नहीं होगा। आदमी को स्वस्थकर देने से जिंदगी ज्यादा सुखी हो जाएगी, लेकिन ज्यादा अभय नहीं होगी। अभय तो सिर्फ एक ही स्थितिमें, फियरलेसनेस एक ही स्थिति में आती है कि मुझे भीतर पता चल जाए कि कुछ है जो मरता ही नहीं। उसके बिना कभी नहीं हो सकता।
तो ध्यान उस अमरत्व का बोध है। वह जो मेरे भीतर है, वह कभी नहीं मरता है। और वह जो मेरे बाहर है, वह मरता ही है। इसलिए जो बाहर है,उसकी चिकित्सा करो कि वह जितने दिन जिए, सुख से जिए। और वह जो भीतर है, उसका स्मरण करो कि मृत्यु भी द्वार पर खड़ी हो जाए तो भय न कंपा दे।”
-ओशो

“गुरु बिन ज्ञान नाही- ओशो”

” गुरु बिन ज्ञान नाहीं ” ~ ओशो :-
” बुद्ध अदभुत गुरु हैं। बुद्ध दोनों बातें कहते हैं। कहते हैः गुरु के संग ज्ञान नहीं होगा। औरदीक्षा देते है! और शिष्य बनाते हैं! और कहते हैः किसको शिष्य बनाऊं ? कैसे शिष्य बनाऊं ? मैंने खुद भी बिना शिष्य बने पाया ! तुम भी बिना शिष्य बने पाओगे। फिर भी शिष्य बनातें है…” : –
” दुनिया में तीन तरह के गुरु संभव हैं। एक तो जो गुरु कहता है:गुरु के बिना नहीं होगा। गुरु बनाना पड़ेगा। गुरु चुनना पड़ेगा। गुरु बिन नाहीं ज्ञान। यह सामान्य गुरु है। इसकी बड़ी भीड़ है। और यह जमता भी है। साधारण बुद्धि के आदमी को यह बात जमती है। क्योंकि बिना सिखाए कैसे सीखेंगे ? भाषा भी सीखते, तो स्कूल जाते। गणित सीखते, तो किसी गुरु के पास सीखते। भूगोल, इतिहास, कुछ भी सीखते हैं, तो किसी से सीखते हैं। तो परमात्मा भी किसी से सीखना होगा। यह बड़ा सामान्य तर्क है-थोथा, ओछा, छिछला-मगर समझ में आता है आम आदमी के कि बिना सीख कैसे सीखोगे। सीखना तो पड़ेगा ही। कोई न कोई सिखाएगा, तभी सीखोगे।
इसलिए निन्यानबे प्रतिशत लोग ऐसे गुरु के पास जाते हैं, जो कहता है, गुरु के बिना नहीं होगा।और स्वभावतः जो कहता है गुरु के बिना नहीं होगा, वह परोक्षरूप से यह कहता हैः मुझे गुरु बनाओ। गुरु के बिना होगा नहीं। और कोई गुरु ठीक है नहीं। तो मैं ही बचा। अब तुम मुझे गुरु बनाओ!
दूसरे तरह का गुरु भी होता है। जैसे कृष्णमूर्ति हैं। वे कहते हैः गुरु हो ही नहीं सकता। गुरु करने में ही भूल है। जैसे एक कहता हैः गुरु बिन नाहीं ज्ञान। वैसे कृष्णमूर्ति कहते हैः गुरु संग नाही ज्ञान! गुरु से बचना। गुरु से बच गए, तो ज्ञान हो जाएगा। गुरु में उलझ गए, तो ज्ञानकभी नहीं होगा।
सौ में बहुमत, निन्यानबे प्रतिशतलोगों को पहली बात जमती है। क्योंकि सीधी-साफ है। थोड़े से अल्पमत को दूसरी बात जमती है। क्योंकि अहंकार के बड़े पक्ष में है।
तो जिनको हम कहते हैं बौद्धिक लोग, इंटेलिजेन्सिया, उनको दूसरीबात जमती है। पहले सीधे-सादे लोग, सामान्यजन, उनको पहली बात जमती है। जो अत्यंत बुद्धिमान हैं, जिन्होंने खूब पढ़ा-लिखा है, सोचा है, चिंतन को निखारा-मांजा है, उन्हे दूसरी बात जमती है। क्योंकि उनको अड़चन होती है किसी को गुरु बनाने में। कोई उनसे ऊपररहे, यह बात उन्हें कष्ट देती है।
कृष्णमूर्ति जैसे व्यक्ति को सुनकर वे कहते हैः अहा! यही बात सच है। तो किसी को गुरु बनाने की कोई जरूरत नहीं है! किसी के सामने झुकने की कोई जरूरत नहीं है ! उनके अहंकार को इससे पोषण मिलता है।
अब तुम फर्क समझना।
पहला जिस आदमी ने कहा कि गुरु बिन ज्ञान नाहीं; और उसने यह भी समझाया कि और सब गुरु तो मिथ्या; सदगुरु मैं। और इसी तरह, मिथ्यागुरु जिनको वह कह रहा है, वे भी कह रहे हैं कि और सब मिथ्या, ठीक मैं।
तो गुरु के बिना ज्ञान नहीं हो सकता है – इस बात का शोषण गुरुओं ने किया गुलामी पैदा करने के लिए; लोगों को गुलाम बना लेने के लिए। सारी दुनिया इस तरह गुलाम हो गयी। कोई हिंदू है; कोई मुसलमान है; कोई ईसाई है; कोई जैनहै।
ये सब गुलामी के नाम हैं। अलग-अलग नाम। अलग-अलग-ढंग! अलग-अलग कारागृह! मगर सब गुलामी के नाम हैं।
तो पहली बात का शोषण गुरुओं ने कर लिया। उसमें भी आधा सच था। और दूसरी बात का शोषण गुरुओं ने कर लिया। उसमें भी आधा सच था। और दूसरी बात का शोषण शिष्य कर रहे हैं, उसमें भी आधा सच है। कृष्णमूर्ति की बात में भी आधा सच है।
पहली बात में आधा सच है कि गुरु बिन नाहीं ज्ञान। क्योंकि गुरु के बिना तुम साहस जुटा न पाओगे। जाना अकेले है। पाना अकेले है। जिसे पाना है, वह मिला ही हुआ है।कोई और उसे देने वाला नहीं है। फिर भी डर बहुत है, भय बहुत है, भयके कारण कदम नहीं बढ़ता अज्ञात में।
पहली बात सच है; – आधी सच है – कि गुरु के साथ सहारा चाहिए। उसका शोषण गुरुओं ने कर लिया। वह गुरुओं के हित में पड़ी बात। दूसरी बात भी आधी सच है – कृष्णमूर्ति की। गुरु बिन नाही ज्ञान की बात ही मत करो, गुरु संगनहीं ज्ञान। क्यों ? क्योंकि सत्य तो मिला ही हुआ है, किसी के देने की जरूरत नहीं है। और जो देने का दावा करे, वह धोखेबाज है।सत्य तुम्हारा है; निज का है; निजात्मा में है; इसलिए उसे बाहरखोजने की बात ही गलत है। किसी के शरण जाने की कोई जरूरत नहीं है। आशरण हो रहो।
बात बिल्कुल सच है; पर आधी। इसका उपयोग अहंकारी लोगों ने कर लिया, अहंकारी शिष्यों ने।
पहले का उपयोग कर लिया अहंकारी गुरुओं ने – कि गुरु के बिना ज्ञान नहीं होगा, इसलिए मुझे गुरु बनाओ। दूसरे का उपयोग कर लिया अहंकारी शिष्यों ने, उन्होंने कहाः किसी को गुरु बनाने की जरूरत नहीं है। हम खुद ही गुरु है। हम स्वयं ही गुरु हैं। कहीं झुकने की कोई जरूरत नहीं है।
बुद्ध अदभुत गुरु हैं। बुद्ध दोनों बातें कहते हैं। कहते हैः गुरु के संग ज्ञान नहीं होगा। औरदीक्षा देते है! और शिष्य बनाते हैं! और कहते हैः किसको शिष्य बनाऊं ? कैसे शिष्य बनाऊं ? मैंने खुद भी बिना शिष्य बने पाया! तुम भी बिना शिष्य बने पाओगे। फिर भी शिष्य बनातें है।
बुद्ध बड़े विरोधाभासी हैं। यही उनकी महिमा है। उनके पास पूरा सत्य है। और जब भी पूरा सत्य होगा, तो पैराडाक्सिकल होगा; विरोधाभासी होगा। जब पूरा सत्य होगा, तो संगत नहीं होगा। उसमें असंगति होगी। क्योंकि पूरे सत्य में दोनों बाजुएं एक साथ होंगी।
पूरा आदमी होगा, तो उसका बायां हाथ भी होगा, और दायां हाथ भी होगा। जिसके पास सिर्फ बायां हाथहै, वह पूरा आदमी नहीं है। उसका दायां हाथ नहीं है। हालांकि एक अर्थ में वह संगत मालूम पड़ेगा, उसकी बात में तर्क होगा।
बुद्ध की बात अतर्क्य होगी, तर्कातीत होगी, क्योंकि दो विपरीत छोरों को इकटठा मिला लियाहै। बुद्ध ने सत्य को पूरा-पूरा देखा है। तो उनके सत्य में रात भी है, और दिन भी है। और उनके सत्य में स्त्री भी है, और पुरुष भी है, और उनके सत्य में जीवन भी है, और मृत्यु भी है। उन्होंने सत्य को इतनी समग्रता में देखा, उतनी ही समग्रता में कहा भी।
तो वे दोनों बात कहते हैं। वे कहते हैः किसको शिष्य बनाऊं ? औररोज

શું આપ જ્ઞાતિવાદથી ખુશ છો…???

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તા-૮/૯/૨૦૧૨. સત્યમેવ જયતે નો એપિસોડ જ્ઞાતિવાદ પર આધારીત હતો.
ભારત ની આ સમસ્યા (અને મારી ભાષા માં બીમારી) આમ તો બહુ જુની છે.અને જ્ઞાતિવાદ નું ઝેર આપણને બાળપણ માં જ પાવામાં આવે છે.તેથી આ સમસ્યાનું નિવારણ હાલ ના તબક્કે મને દેખાતું નથી…?
મારે અહી જ્ઞાતિવાદ જશે કે નહિ તે મુદ્દે ચર્ચા નથી કરવી પણ જ્ઞાતિ આધારીત કોઈ બીજા ની ગંદકી ઉઠાવાની ફરજ પાડવામાં આવે છે તે તદ્દન અમાનીવીય કૃત્ય છે,જે સત્વરે બંધ થવું જોઈએ.
જયારે કોઈ આંતકવાદી/ગુંડા ના એન્કાઉન્ટર થાય છે ત્યારે બિલાડા ના ટોપ ની જેમ ફૂટી નીકળતા (કેહવાતા અને વિદેશો ની દલાલી કરતા) માનવાધિકાર સંસ્થાઓ આંતકવાદી/ગુંડા ને ન્યાય અપાવવા મરણીયા થાય જાય છે.જાણે આંતકવાદી/ગુંડાઓ તેમના સગા-વહાલાં ના હોય…!!!!
ઘણા-ખરા એક્ટરો(મહેશ ભટ્ટ એમ કોણ બોલ્યું?) પણ જાણે હોદ માં નહાવા પડતા હોય તેમ કુદી પડે છે,અને માનવાધિકારઓ બની જય છે.એમને બીજા કામ નહિ હોય…!!!
ક્યારેય પણ એવું આપે સાંભળ્યું છે કે કોઈ માનવાધિકારવાળાએ  સફાયકામદાર જ્ઞાતિવાદ આધારિત ન હોવો જોઈએ તે અંગે સરકાર કે કોર્ટ માં ફરિયાદ કરી હોય.(મેં તો ક્યારેય નથી સાંભળ્યું..!) તેમને તો બસ આંતકવાદી/ગુંડાઓ ને બચાવવા એજ માનવાધિકાર લાગે છે,તેમના નજર માં આવી અમાનવીય પ્રવૃત્તિ નહિ આવતી હોય (ક્યાંથી આવે આવા આંદોલન કે ચળવળ માટે થોડા વિદેશ થી ફંડ આવે..??)

આમ તો જ્ઞાતિવાદ/ભેદભાવ એ દુષણ છે,તે ૧૦૦% સાચી વાત પણ આપણે તેનો હિસ્સો છીએ અને કોઈને કોઈ રૂપે પ્રોત્સાહન આપીએ છીએ તે ૧૦૦૦% કડવી વાત છે…..!!!!!!!!!
 
જ્ઞાતિવાદ પર પ્રકાશ ફેકતું સ્વામી સચ્ચ્દાનંદ( Swami Sachidanand) નું મેં એક પુસ્તક વાંચું હતું “અધોગતિનું મૂળ વર્ણવ્યવસ્થા”(Adhogatinun Mool Varnavyavastha) જે ખુબ જ ચોટદાર અને ધારદાર છે,તે બધા ને વાંચવું જોઈએ.
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અબુ હમઝા આંતકવાદી શા માટે ભારત આવ્યો……?

૨૬/૧૧ કેસનો મહત્વનો ત્રાસવાદી અબુ હમઝા પકડાયો

આજકાલ આખા દેશ માં અબુ હમઝા નામક આંતકવાદી ની ધરપકડ થઈ તેની ચર્ચા ચારેકોર છે.અને તે કોમનમેન નું કામ પણ ગણાય…!! આમ તો આપણા મન માં એક પ્રશ્ન થાઈ કે તે ભારત પાછો કેમ આવ્યો હશે? તેના ચેલા અઝમલ કસાબ ની જે રીતે થાણે જેલ માં ચાકરી થઈ છે.!! તે જોતા તેને થયું હશે કે ચાલ ને હું પણ પકડાય જાઉં,આ લોકો (ભારત ના નફ્ફટ નેતાઓ) મને કઈ ફાંસી તો આપવા ના નથી? તો પછી ફાઈવસ્ટાર હોટલ માં રહેવું તેના કરતા આપણે પકડાઈ જઈએ!? આમ પણ આપણા રાષ્ટપતિ ખુબ જ દયાળુ છે તે ફટ દઈને ફાંસી ની સજા માફ કરું દેશે..!!(મારું તો એવું માનવું છે કે થોડા સમય માં આપની સંસદ એવો કાયદો લાવશે કે   આંતકવાદીઓં ચુંટણી  લડી શકે…!!!! અને તેને માનવાધિકાર માં સમાવેશ કરશે?? હા હા આ કઈ જોક્સ નથી ભારત માં બધું જ શક્ય છે.)

આ કાર્ટૂન ઘણું-બધું કહી જાય છે…!!!

ગુરુદેવ નમઃ

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न गुरु: अधिकं तत्त्वं

न गुरु: अधिकं तप: |

न गुरु: अधिकं ज्ञानं 

तस्मै श्रीगुरवे नम: ||• •

અર્થાત ” ગુરુથી કોઈ શ્રેષ્ઠ તત્વ નથી, ગુરુથી અધિક તપ નથી અને ગુરુથી વિશેષ કોઈ જ્ઞાન નથી એવા શ્રી ગુરુદેવને નમસ્કાર.”
• •
આપણો ભારત દેશ ” વિશ્વ ગુરુ ” તરીકે ગૌરવવંતુ સ્થાન ધરાવે છે. ગુરુનું પૂજન એ ભારતીય પરંપરા છે. આ સમાજનું ઘડતર કરનાર અને સમાજને સુરક્ષિત રાખવામાં મોટામાં મોટો ફાળો હોય તો એ ગુરુનો છે. આજનો દરેક વિદ્યાર્થી ભવિષ્યનો નાગરિક છે. તે સમગ્ર દેશનો આધાર સ્તંભ છે. તે ઈમારતનો એક પાયો છે. એ પાયાને મજબૂત કરવાનું કામ ગુરુ કરે છે. તેઓ ઈમારતનું પાકું ચણતર કરી તેને કદી ડગવા દેતા નથી. નીચેની પંક્તિમાં આવા જ કોઈ ગુરુનું ચિંતન પડઘાય છે.

” વાવવા છે બીજ મારે બાળકોના દિલ મહીં, 

વૃક્ષ થઈને ઊગશે એ નામ જિજ્ઞાસા ધરી !

જ્ઞાનરૂપી ફળ પછી તો આવશે એ વૃક્ષ પર,

શીખવી દેશે સહજમાં જીવવાનું જિંદગી ! “

ગુરુ વિનાનું જીવન જાણે પાચન વગરના ભોજન જેવું છે. વર્ષો જૂના મહેલમાં ભરાયેલા કચરાને દૂર કરવા જેટલી ધીરજ જરૂરી છે, તેટલી જ ધીરજ વિદ્યાભ્યાસમાં જરૂરી છે. અને તે ધીરજની શક્તિ આપનાર કેવળ કોઈ ગુરુ જ હોય શકે.

તેથી શિષ્ય ગુરુના પાદપંકજમાં પાર્થના કરે છે કે,• •

” मेरी नैया पर लगादो, गुरु ज्योत से ज्योत जगादो ।

काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह से गुरूजी हमको बचालो ।

सद्गुरुके शुंगार से, अब तो गुरूजी हमको सजालो । “

ગુરુ અને શિષ્ય બંને વચ્ચે એટલી તેજસ્વી શક્તિ છે કે કદાચ સૂર્યનું તેજ પણ તેમની પાસે ઝાંખું પડે ! માનવીનો શારીરિક વિકાસ તો તેની માતા કરે છે, પરંતુ માનવી પોતાનો માનસિક અને આધ્યાત્મિક વિકાસ ગુરુ પાસેથી પ્રાપ્ત કરે છે. ‘ ગુરુ એ ગુરુનો પણ ગુરુ છે. ‘ અર્થાત આપણા જે ગુરુ છે, તેમના પણ કોઈ ગુરુ છે. અને તેમના પણ. આમ આ પરંપરા છેક પૂર્વે ઋષિઓના સમય સુધીની છે. કહેવાય છે કે,

” ક્ષણે ક્ષણે જે નવું શીખવે એનું નામ શિક્ષણ.

જે માતૃહૃદય રાખીને શીખવે એનું નામ શિક્ષક.”

‘ Good teachers Think before they act, Think while they act, Think after they act.’

(સારા શિક્ષક એ જ છે કે જે કાર્ય કરતા પહેલા વિચારે છે, કાર્ય કરતી વખતે વિચારે છે, અને કાર્ય કર્યા બાદ પણ તેનું જ ચિંતન કરે છે.)

ગુરુ વિદ્યાર્થીનો જ્ઞાનપિતા છે. જ્ઞાનની ભાષામાં તે વિદ્યાર્થીને પણ ગુરુ બનાવી દે છે. જ્ઞાનના આ ઝરણામાં પોતે હોડકું બની વિદ્યાર્થીને કિનારે પહોંચાડે છે. ‘ જે વ્યક્તિ સાચો માર્ગ દર્શાવે તે જ ગુરુ.’ પછી તે ધાર્મિક હોય કે જ્ઞાનીય. એક કવિએ કહ્યું છે કે,

” जो बात दवा से हो न शके, 

वो बात दुआ से होती हे, 

काबिल गुरु जब मिलता हे,

तो बात खुदा से होती हे । “

મનુષ્યની સફળતા પાછળ તેના જ્ઞાની ગુરુના આશિર્વાદ તેમજ પ્રેરણા રહેલા હોય છે. માનવીની અંદર સુષુપ્ત શક્તિ સ્વરૂપે તેજ રહેલું છે. આ માનવ – તેજમાંથી તેજપુંજ બનવા તેજોમય ગુરુનું સાનિધ્ય જરૂરી છે. ઉદાહરણ તરીકે જોઈએ તો કોઈ કારીગર પોતાના અથાગ પ્રયત્નથી હીરાને ઘસીને ચકચકિત કરી દે છે. તેવી જ ગુરુ એક અજ્ઞાની શિષ્યને જ્ઞાની બનાવે છે. એક કાળા હિરાને ઘસી તેને એટલો પ્રકાશિત કરે છે કે હિરાને એક અંધારા ઓરડામાં મૂકતા આખા ઓરડામાં પ્રકાશ ફેલાય છે. ગુરુના હાથે આ જ્ઞાની બનેલો શિષ્ય આ દુનિયામાં એક નવો પ્રકાશ ફેલાવે છે.

સંત કબીરે પણ ભાવપૂર્ણ શબ્દોમાં કહ્યું છે_• •

” गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागूँ पाय ।

बलिहारी गुरुदेव की गोविन्द दियो बताय ।। “

આવા સદગુરુને જો ઉપમા આપવી જ હોય તો લોઢાનું સોનું બનાવનાર પારસમણીની આપી શકાય, પરંતુ તે પણ અધૂરી છે. પારસમણી લોખંડને સોનું બનાવે છે, પરંતુ પોતાના જેવો પારસમણી બનાવતો નથી. ગુરુ તો શિષ્યને પોતાનું ગુરુત્વ આપે છે. તેમજ પોતાના શિષ્યોમાં કોઈ ભેદ રાખતા નથી. ધન્ય છે એવા ગુરુને કે જેનો આપણા પર વર્ષોથી ઉપકાર છે અને રહેશે. કહેવાય છે કે_

” સદગુરુ તમારે શરણે આવે, ગરીબ ને ધનવાન ;

(સૌજન્ય:-કિશન રાડીયા ફેસબુક ની પોસ્ટ  http://www.facebook.com/photo.php?fbid=446681812019936&set=vxywtia.1341140169.1341310685.199428306745289&type=1&ref=notif&notif_t=photo_tag&theater )

हमारा समाज क्या है ……. ?

हमारा समाज क्या है ……. ?
समाज को मतलब, आपका जो चेहरा प्रकट होता है, उससे है; आपकी जो आत्मा अप्रकट रह जाती है, उससे नहीं है। इसलिए समाज इसकी चिंता ही नहीं करता कि भीतर आप कैसे हैं। समाज कहता है, बाहर आप कैसे हैं, बस हमारी बात पूरी हो जाती है। बाहर आप ऐसा व्यवहार करें जोसमाज के लिए अनुकूल है, समाज के जीवन के लिए सुविधापूर्ण है, सबके साथ रहने में व्यवस्था लाताहै, अव्यवस्था नहीं लाता। समाज की चिंता आपके आचरण से है। धर्म की चिंता आपकी आत्मा से है।
इसलिए समाज इतना फिक्र भर कर लेता है कि आदमी का बाह्य रूप ठीक हो जाए, बस इसके बाद फिक्र छोड़ देता है। बाह्य रूप ठीक करनेके लिए वह जो उपाय लाता है, वे उपाय भय के हैं। या तो पुलिस है, अदालत है, कानून है, या पाप-पुण्यका डर है, स्वर्ग है, नरक है। ये सारे भय के रूप उपयोग में लाता है।
अब यह बड़े मजे की बात है कि समाज के द्वारा आचरण की जो व्यवस्था है, वह भय-आधारित है और बाहर तक समाप्त हो जाती है। परिणाम में समाज केवल व्यक्ति को पाखंडी बनापाता है या अनैतिक, नैतिक कभी नहीं। पाखंडी या अनैतिक। पाखंडी इस अर्थों में कि भीतर व्यक्ति कुछ होता है, बाहर कुछ हो जाता है।
और जो व्यक्ति पाखंडी हो गया, उसके धार्मिक होने की संभावना अनैतिक व्यक्ति से भी कम हो जातीहै। इसे समझ लेना जरूरी है। समाजकी दृष्टि में वह आदृत होगा, साधुहोगा, संन्यासी होगा; लेकिन पाखंडी हो जाने के कारण वह अनैतिक व्यक्ति से भी बुरी दशा में पड़ गया है। क्योंकि अनैतिक व्यक्ति कम से कम सीधा है, सरल है, साफ है। उसके भीतर गाली उठती है तो गाली देता है और क्रोध आता है तो क्रोध करता है। वह आदमी स्पष्ट है, स्पांटेनियस है एक अर्थों में। सहज है, जैसा है, वैसा है। बाहर और भीतर में उसके फर्क नहीं है।
परम ज्ञानी के भी बाहर और भीतर में फर्क नहीं होता। परम ज्ञानी जैसा भीतर होता है, वैसा ही बाहर होता है। अज्ञानी जैसा बाहर होताहै, वैसा ही भीतर होता है। बीच में एक पाखंडी व्यक्ति है, जो भीतर कुछ होता है, बाहर कुछ होता है। पाखंडी व्यक्ति का मतलब है कि बाहर वह ज्ञानी जैसा होता है और भीतर अज्ञानी जैसा होता है। पाखंडी का मतलब है कि भीतरी अज्ञानी जैसा–उसके भीतर भी गालीउठती है, क्रोध उठता है, हिंसा उठती है–और बाहर वह ज्ञानी जैसाहोता है, अहिंसक होता है, अहिंसा परमो धर्मः की तख्ती लगा कर बैठता है, सच्चरित्रवान दिखाई पड़ता है, सब नियम पालन करता है, अनुशासनबद्ध होता है। बाहर का उसका व्यक्तित्व लेता है वह ज्ञानी से उधार और भीतर का व्यक्तित्व वही होता है जो अज्ञानी का है।
यह जो पाखंडी व्यक्ति है, जिसको समाज नैतिक कहता है, यह व्यक्ति कभी भी, कभी भी उस दिशा को उपलब्धनहीं होगा, जहां धर्म है। अनैतिक व्यक्ति उपलब्ध हो भी सकता है। इसलिए अक्सर ऐसा होता है कि पापीपहुंच जाते हैं और पुण्यात्मा भटक जाते हैं, क्योंकि पापी के दोहरे कारण हैं पहुंच जाने के। एक तो पाप दुखदायी है। प्रकट पापबहुत दुखदायी है। उसकी पीड़ा है। वह पीड़ा ही रूपांतरण लाती है। दूसरी बात यह है कि पाप करने के लिए साहस चाहिए। समाज के विपरीत जाने के लिए भी साहस चाहिए।
जो पाखंडी लोग हैं, वे मीडियाकर हैं, उनमें साहस बिलकुल नहीं है। साहस न होने की वजह से चेहरा वे वैसा बना लेते हैं, जैसा समाज कहता है–समाज के डर के कारण–और भीतर वैसे रहे आते हैं, जैसे वे हैं। अनैतिक व्यक्ति के पास एक करेज है, एक साहस है।
– ओशो

प्रेम और समर्पण ……. !

प्रेम और समर्पण ……. !
दुनिया की बहुत सी प्रयोगशालाओं में निर्णीत निष्कर्ष ले लिए गए हैं कि प्रेम जीवन को बढ़ाता है। जिस गुलाब को तुमने प्रेम किया, उसके फूल बड़े होंगे। होने ही चाहिए। क्योंकि तुमने उसे गरिमा दी। पौधे के प्राण पुलकित हैं। वह तुम्हें प्रसन्न करना चाहता है; तुमने उसे प्रसन्न किया। तुमने उसे दिया; वह तुम्हें लौटाना चाहता है। वह एक बड़े फूल की तरह–और क्या कर सकता है? एक बड़े फूल की तरह खिलेगा।
सदगुरुओं के प्रेम के नीचे शिष्यपरमात्मा को उपलब्ध हो गए हैं। बिना कुछ किए भी कभी यह घटा है। और कभी-कभी बहुत कुछ करने पर भी, अगर सदगुरु की प्रेम-छाया न हो, तो कुछ भी नहीं घटा है। इसलिए तो समर्पण का इतना मूल्य है। समर्पणका कुल इतना ही अर्थ है कि गुरु के जीवन से जो प्रेम की धारा बह रही है, उसके लिए तुम दीवार मत बनो, दरवाजा बन जाओ। उसे आने दो, ताकि वह तुम्हें रूपांतरित कर दे। प्रेम जीवन है। प्रेम से रहित जीवन का कोई अर्थ नहीं है। और प्रेम से भरी हुई मृत्यु भी सार्थक हो जाती है। प्रेम से भरीमृत्यु में भी एक काव्य प्रकट होता है – अलौकिक।
– ओशो

प्रभु को जानना है, तो स्वयं को जीतो ……. !

प्रभु को जानना है, तो स्वयं को जीतो ……. !
मनुष्य का मन दासता में है। हम अपने ही दास पैदा होते हैं। वासना की जंजीरों के साथ ही जगत में हमारा आना होता है। बहुत सूक्ष्म बंधन हमें बांधे हैं।
परतंत्रता जन्मजात है। वह प्रकृति प्रदत्त है। हमें उसे कमाना नहीं होता। मनुष्य पाता हैकि वह परतंत्र है। पर, स्वतंत्रता अर्जित करनी होती है। उसे वही उपलब्ध होता है, जो उसके लिए श्रम और संघर्ष करता है। स्वतंत्रता के लिये मूल्य देना होता है। जीवन में जो भी श्रेष्ठ है, वह निर्मूल्य नहीं मिलता। प्रकृति से मिली परतंत्रता दुर्भाग्य नहीं है। दुर्भाग्य है, स्वतंत्रता अर्जित न कर पाना। दास पैदा होनाबुरा नहीं, पर दास ही मर जाना अवश्य बुरा है।
अंतस की स्वतंत्रता को पाये बिनाजीवन में कुछ भी सार्थकता और कृतार्थता तक नहीं पहुंचता है। वासनाओं की कैद में जो बंद हैं, और जिन्होंने विवके का मुक्ताकाश नहीं जाना है, उन्होंने जीवन तो पाया, पर वे जीवन को जानने से वंचित रह गये हैं। पिंजड़ों में कैद पक्षियों और वासनाओं की कैद में पड़ी आत्माओं के जीवन में कोई भेद नहीं है। विवके जब वासना से मुक्त होता है, तभी वास्तविक जीवन के जगत में प्रवेश होता है।
प्रभु को जानना है, तो स्वयं को जीतो। स्वयं से ही जो पराजित हैं,प्रभु के राज्य की विजय उनके लिये नहीं है।
– ओशो

आंसू – एक अनूठी सम्पदा ……. !

आंसू – एक अनूठी सम्पदा ……. !
आंसुओं से कभी भी भयभीत मत होना।तथाकथित सभ्यता ने तुम्हें आंसुओं से अत्यंत भयभीत कर दिया है। इसने तुम्हारे भीतर एक तरह का अपराध भाव पैदा कर दिया है। जब आंसू आते हैं तो तुम शर्मिंदामहसूस करते हो। तुम्हें लगता है कि लोग क्या सोचते होंगे? मैं पुरुष होकर रो रहा हूं!यह कितना स्त्रैण और बचकाना लगता है। ऐसा नहीं होना चाहिये। तुम उन आंसुओंको रोक लेते हो… और तुम उसकी हत्या कर देते हो जो तुम्हारे भीतर पनप रहा होता है।
जो भी तुम्हारे पास है, आंसू उनमें सबसे अनूठी बात है, क्योंकि आंसू तुम्हारे अंतस के छलकने का परिणाम हैं। आंसू अनिवार्यत: दुख के ही द्योतक नहीं हैं; कई बार वे भावातिरेक से भी आते हैं, कई बार वे अपार शांति के कारण आते हैं, और कई बारवे आते हैं प्रेम व आनंद से। वास्तव में उनका दुख या सुख से कोई लेना-देना नहीं है। कुछ भी जो तुमारी ह्रदय को छू जाये, कुछ भी जो तुम्हें अपने में आविष्ट कर ले, कुछ भी जो अतिरेक में हो, जिसे तुम समाहित न कर सको, बहने लगता है, आंसुओं के रूप में ।
इन्हें अत्यंत अहोभाव से स्वीकार करो, इन्हें जीयो, उनका पोषण करो, इनका स्वागत करो, और आंसुओं से ही तुम जान पाओगे प्रार्थना करने की कला।
आंसुओं से तुम सीखोगे देखने की कला। आंसुओं से भरी आंखें सत्य को देखने की क्षमता रखती हैं। आंसुओं से भरी आंखें क्षमता रखतीहैं जीवन के सौंदर्य को और इसके प्रसाद को महसूस करने की ……. !
– ओशो