” जगत ऊर्जा का विस्तार है ” ~ ओशो : –

” जगत ऊर्जा का विस्तार है ” ~ ओशो : –
” अठारहवीं सदी में वैज्ञानिकों की घोषणा थी कि परमात्मा मर गया है, आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है, पदार्थ ही सब कुछ है। लेकिन विगत तीस वर्षों में ठीक उलटी स्थिति हो गई है। विज्ञान को कहना पड़ा कि पदार्थ है ही नहीं, सिर्फ दिखाई पड़ता है। ऊर्जा ही सत्य है, शक्ति ही सत्य है। लेकिनशक्ति की तीव्रगति के कारण पदार्थ का भास होता है।
दीवालें दिखाई पड़ रही हैं एक, अगर निकलना चाहेंगे तो सिर टूट जाएगा। कैसे कहें कि दीवालें भ्रम हैं? स्पष्ट दिखाई पड़ रही हैं, उनका होना है। पैरों के नीचेजमीन अगर न हो तो आप खड़े कहां रहेंगे?
नहीं, इस अर्थों में नहीं विज्ञान कहता है कि पदार्थ नहीं है। इस अर्थों में कहता है कि जो हमें दिखाई पड़ रहा है, वैसा नहींहै।
अगर हम एक बिजली के पंखे को बहुत तीव” गति से चलाएं तो उसकी तीन पंखुड़ियां तीन दिखाई पड़नी बंद हो जाएंगी। क्योंकि पंखुड़ियां इतनी तेजी से घूमेंगी कि उनके बीच की खाली जगह, इसके पहले कि आपदेख पाएं, भर जाएगी। इसके पहले किखाली जगह आंख की पकड़ में आए, कोईपंखुड़ी खाली जगह पर आ जाएगी। अगर बहुत तेज बिजली के पंखे को घुमाया जाए तो आपको टीन का एक गोल वृत्त घूमता हुआ दिखाई पड़ेगा, पंखुड़ियां दिखाई नहीं पड़ेंगी। आप गिनती करके नहीं बतासकेंगे कि कितनी पंखुड़ियां हैं। अगर और तेजी से घुमाया जा सके तो आप पत्थर फेंक कर पार नहीं निकाल सकेंगे, पत्थर इसी पार गिर जाएगा। अगर और तेज घुमाया जा सके, जितनी तेजी से परमाणु घूम रहे हैं, अगर उतनी तेजी से बिजली के पंखे को घुमायाजा सके, तो आप मजे से उसके ऊपर बैठ सकते हैं, आप गिरेंगे नहीं। और आपको पता भी नहीं चलेगा कि पंखुड़ियां नीचे घूम रही हैं। क्योंकि पता चलने में जितना वक्तलगता है, उसके पहले नई पंखुड़ी आपके नीचे आ जाएगी। आपके पैर खबरदें आपके सिर को कि पंखुड़ी बदल गई, इसके पहले दूसरे पंखुड़ी आ जाएगी। बीच के गैप, बीच के अंतरालका पता न चले तो आप मजे से खड़े रह सकेंगे।
ऐसे ही हम खड़े हैं अभी भी। अणु तीव्रता से घूम रहे हैं, उनके घूमने की गति तीव्र है इसलिए चीजें ठहरी हुई मालूम पड़ती हैं।जगत में कुछ भी ठहरा हुआ नहीं है। और जो चीजें ठहरी हुई मालूम पड़ती हैं, वे सब चल रही हैं।
अगर वे चीजें ही होती चलती हुई तो भी कठिनाई न थी। जितना ही विज्ञान परमाणु को तोड़ कर नीचे गया तो उसे पता चला कि परमाणु के बाद तो फिर पदार्थ नहीं रह जाता, सिर्फ ऊर्जा कण, इलेक्ट्रांस रह जाते हैं, विद्युत कण रह जाते हैं। उनको कण कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि कण से पदार्थ का खयालआता है। इसलिए अंग्रेजी में एक नया शब्द उन्हें गढ़ना पड़ा, उस शब्द का नाम क्वांटा है। क्वांटाका मतलब है: कण भी, कण नहीं भी; कणभी और लहर भी, एक साथ। विद्युत कीतो लहरें हो सकती हैं, कण नहीं होसकते। शक्ति की लहरें हो सकती हैं, कण नहीं हो सकते। लेकिन हमारी भाषा पुरानी है, इसलिए हम कण कहे चले जाते हैं। ऐसे कण जैसी कोई भी चीज नहीं है। अब विज्ञान की नजरों में यह सारा जगत ऊर्जा का, विद्युत की ऊर्जा का विस्तार है।
योग का पहला सूत्र यही है: जीवन ऊर्जा है, शक्ति है। ”
ஜ۩۞۩ஜ ॐॐॐ ओशो ॐॐॐ ஜ۩۞۩ஜ
~ योग नये आयाम पुस्तक से # 1

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” ज़ेन हाइकु

” ज़ेन हाइकु : मरणासन्न झींगुर — कैसा जीवन्त, उसका गान ” ~ ओशो :-
” प्रत्येक सतर्क और जागरुक व्यक्ति की ऐसी ही अवस्था होनी चाहिए।
मृत्यु के समय भी, गाता हुआ – और तब कोई मृत्यु नहीं है। ”
ஜ۩۞۩ஜ ॐॐॐ ओशो ॐॐॐ ஜ۩۞۩ஜ
~ ह्यकुजो:दि एवरेस्ट औफ़ ज़ेन

” व्यस्त लोगों के लिये ध्यान : टकटकी लगाकर देखना ” ~ ओशो : –

” व्यस्त लोगों के लिये ध्यान : टकटकी लगाकर देखना ” ~ ओशो : –
# पहला चरण : दूसरे का अवलोकन करो : –
“बैठ जायें और एक दूसरे की आखों में देखें (बेहतर होगा पलकें कम से कम झपकें, एक कोमल टकटकी) बिनासोचे गहरे, और गहरे देखें।
यदि आप सोचते नहीं, यदि आप केवल आंखों के भीतर टकटकी लगाकर देखतेहैं तो शीघ्र ही तरंगें विलीन होजायेंगी और सागर प्रकट होगा। यदिआप आंखों में गहरे देख सकते हैं तो आप अनुभव करेंगे कि व्यक्ति विलीन हो गया है, मुखड़ा मिट गया। एक सागरीय घटना पीछे छिपी है और यह व्यक्ति बस उस गहराई का लहराना था, कुछ अनजाने की, कुछ छुपे हुए की एक तरंग।”
पहले तुम यह किसी व्यक्ति के साथकरो क्योंकि तुम इस तरह की तरंग के अधिक नज़दीक हो। फिर जानवरों के साथ करो-थोड़ा सा दूर। फिर पेड़ों के पास जाओ- थोड़ी सी और दूरकी तरंग; फिर चट्टानों के पास। ”
# दूसरा चरण: सागरीय चेतना : –
“शीघ्र ही आपको अपने चारों ओर सागरीय चेतना का बोध होगा। तब आपदेखेंगे कि आप भी एक तरंग हैं; आपका अहंकार भी एक तरंग है।
उस अहंकार के पीछे, उस अनाम के पीछे वह एक छिपा है। केवल तरंगे उठती हैं, सागर वैसा ही रहता है। अनेक पैदा होते हैं लेकिन वह एक वैसा ही रहता है।”
ஜ۩۞۩ஜ ॐॐॐ ओशो ॐॐॐ ஜ۩۞۩ஜ
~ वेदांता: सेवन स्टेप्स टु समाधि

” स्त्री और पुरुष को समान हक होना चाहिए। ” ~ ओशो : –

” स्त्री और पुरुष को समान हक होना चाहिए। ” ~ ओशो : –
” तुम्हारे लिए चरित्र का एक ही अर्थ होता है बस कि स्त्री पुरुषसे बँधी रहे, चाहे पुरुष कैसा ही गलत हो। हमारे शास्त्रों में इसकी बड़ी प्रशंसा की गई है कि अगर कोई पत्नी अपने पति को बूढ़े-,
मरते, सड़ते, कुष्ठ रोग से गलते पति को भी- कंधे पर रखकर वेश्या के घर पहुँचा दी तो हम कहते हैं- ‘यह है चरित्र! देखो, क्या चरित्रहै कि मरते पति ने इच्छा जाहिर की कि मुझे वेश्या के घर जाना है और स्त्री इसको कंधे पर रखकर पहुँचा आई।’ इसको गंगाजी में डुबा देना था, तो चरित्र होता। यहचरित्र नहीं है, सिर्फ गुलामी है। यह दासता है और कुछ भी नहीं।
पश्चिम की स्त्री ने पहली दफा पुरुष के साथ समानता के अधिकार की घोषणा की है। इसको मैं चरित्रकहता हूँ। लेकिन तुम्हारे चरित्र की बढ़ी अजीब बातें हैं। तुम इस बात को चरित्र मानते हो कि देखो भारतीय स्त्री सिगरेट नहीं पीती और पश्चिम की स्त्री सिगरेट पीती है। और भारतीय स्त्रियाँ पश्चिम से आए फैशनों का अंधा अनुकरण कर रही हैं!
अगर सिगरेट पीना बुरा है तो पुरुष का पीना भी बुरा है। और अगर पुरुष को अधिकार है सिगरेट पीने का तो प्रत्येक स्त्री को अधिकार है सिगरेट पीने का। कोई चीज बुरी है तो सबके लिए बुरी है और नहीं बुरी है तो किसी के लिए बुरी नहीं है। आखिर स्त्री में क्यों हम भेद करें? क्यों स्त्रीके अलग मापदंड निर्धारित करें? पुरुष अगर लंगोट लगाकर नदी में नहाए तो ठीक है और स्त्री अगर लंगोटी बाँधकर नदी में नहाए तो चरित्रहीन हो गई! ये दोहरे मापदंड क्यों?
लोग कहते हैं, ‘इस देश की युवतियाँ पश्चिम से आए फैशनों काअंधानुकरण करके अपने चरित्र का सत्यानाश कर रही हैं।’
जरा भी नहीं। एक तो चरित्र है नहीं कुछ…। और पश्चिम में चरित्र पैदा हो रहा है। अगर इस देश की स्त्रियाँ भी पश्चिम की स्त्रियों की भाँति पुरुष के साथअपने को समकक्ष घोषित करें तो उनके जीवन में भी चरित्र पैदा होगा और आत्मा पैदा होगी। स्त्रीऔर पुरुष को समान हक होना चाहिए।
यह बात पुरुष तो हमेशा ही करते हैं। स्त्रियों में उनकी उत्सुकता नहीं है, स्त्रियों के साथ मिलते दहेज में उत्सुकता है।स्त्री से किसको लेना देना है! पैसा, धन, प्रतिष्ठा!
हम बच्चों पर शादी थोप देते थे। लड़का कहे कि मैं लड़की को देखना चाहता हूँ, वह ठीक है। यह उसका हकहै! लेकिन लड़की कहे मैं भी लड़के को देखना चाहती हूँ कि यह आदमी जिंदगीभर साथ रहने योग्य है भी या नहीं- तो चरित्र का ह्रास हो गया, पतन हो गया! और इसको तुम चरित्र कहते हो कि जिससे पहचान नहीं, संबंध नहीं, कोई पूर्व परिचय नहीं, इसके साथ जिंदगी भर साथ रहने का निर्णय लेना। यह चरित्र है तो फिर अज्ञान क्या होगा? फिर मूढ़ता क्या होगी?
पहली दफा दुनिया में एक स्वतंत्रता की हवा पैदा हुई है, लोकतंत्र की हवा पैदा हुई है और स्त्रियों ने उद्‍घोषणा की है समानता की, तो पुरुषों की छाती परसाँप लौट रहे हैं। मगर मजा भी यह है कि पुरुषों की छाती पर साँप लौटे, यह तो ठीक, स्त्रियों की छाती पर साँप लौट रहे हैं। स्त्रियों की गुलामी इतनी गहरी हो गई है कि उनको पता नहीं रहा किजिसको वे चरित्र, सती-सावित्री और क्या-क्या नहीं मानती रही हैं, वे सब पुरुषों के द्वारा थोपे गए जबरदस्ती के विचार थे।
पश्चिम में एक शुभ घड़ी आई है। घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है।भयभीत होने का कोई कारण नहीं है।सच तो यह है कि मनुष्य जाति अब तकबहुत चरित्रहीन ढंग से जी है, लेकिन ये चरित्रहीन लोग ही अपने को चरित्रवान समझते हैं। तो मेरीबातें उनको लगती हैं कि मैं लोगों का चरित्र खराब कर रहा हूँ। मैं तो केवल स्वतंत्रता और बोध दे रहा हूँ, समानता दे रहा हूँ। और जीवन को जबरदस्ती बंधनोंमें जीने से उचित है कि आदमी स्वतंत्रता से जीए। और बंधन जितने टूट जाएँ उतना अच्छा है, क्योंकि बंधन केवल आत्माओं को मार डालते हैं, सड़ा डालते हैं, तुम्हारे जीवन को दूभर कर देते हैं।
जीवन एक सहज आनंद, उत्सव होना चाहिए। इसे क्यों इतना बोझिल, इसे क्यों इतना भारी बनाने की चेष्टा चल रही है? और मैं नहीं कहता हूँ कि अपनी स्वस्फूर्त चेतना के विपरीत कुछ करो। किसी व्यक्ति को एक ही व्यक्ति के साथजीवनभर प्रेम करने का भाव है- सुंदर, अति सुंदर! लेकिन यह भाव होना चाहिए आंतरिक, यह ऊपर से थोपा हुआ नहीं, मजबूरी में नहीं। नहीं तो उस व्यक्ति से बदला लेगावह व्यक्ति, उसी को परेशान करेगा,उसी पर क्रोध जाहिर करेगा। ”
ஜ۩۞۩ஜ ॐॐॐ ओशो ॐॐॐ ஜ۩۞۩ஜ
साभार : बहुरि न ऐसो दाँव
सौजन्य : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन

“आत्मीयता: हम सभी इसे चाहते हैं,और हम सभी इससे बचते हैं। क्यों?” ~ ओशो : –

“आत्मीयता: हम सभी इसे चाहते हैं,और हम सभी इससे बचते हैं। क्यों?” ~ ओशो : –
” सभी आत्मीयता से डरते हैं। यह बात और है कि इसके बारे में तुम सचेत हो या नहीं। आत्मीयता का मतलब होता है कि किसी अजनबी के सामने स्वयं को पूरी तरह से उघाड़ना। हम सभ
ी अजनबी हैं–कोई भी किसी को नहीं जानता। हम स्वयं के प्रति भी अजनबी हैं, क्योंकि हम नहीं जानते कि हम हैं कौन।
आत्मीयता तुम्हें अजनबी के करीब लाती है। तुम्हें अपने सारे सुरक्षा कवच गिराने हैं; सिर्फ तभी, आत्मीयता संभव है। और भय यह है कि यदि तुम अपने सारे सुरक्षाकवच, तुम्हारे सारे मुखौटे गिरा देते हो, तो कौन जाने कोई अजनबी तुम्हारे साथ क्या करने वाला है।
एक तरफ आत्मीयता अनिवार्य जरूरत है, इसलिए सभी यह चाहते हैं। लेकिन हर कोई चाहता है कि दूसरा व्यक्ति आत्मीय हो कि दूसरा व्यक्ति अपने बचाव गिरा दे, संवेदनशील हो जाए, अपने सारे घाव खोल दे, सारे मुखौटे और झूठा व्यक्तित्व गिरा दे, जैसा वह है वैसा नग्न खड़ा हो जाए।
यदि तुम सामान्य जीवन जीते, प्राकृतिक जीवन जीते तो आत्मीयता से कोई भय नहीं होता, बल्कि बहुत आनंद होता-दो ज्योतियां इतनी पास आती हैं कि लगभग एक बन जाए। और यह मिलन बहुत बड़ी तृप्तिदायी, संतुष्टिदायी, संपूर्ण होती है। लेकिन इसके पहले कि तुम आत्मीयता पाओ, तुम्हें अपना घर पूरी तरह से साफकरना होगा।
सिर्फ ध्यानी व्यक्ति ही आत्मीयता को घटने दे सकता है। आत्मीयता का सामान्य सा अर्थ यहीहोता है कि तुम्हारे लिए हृदय केसारे द्वार खुल गए, तुम्हारा भीतर स्वागत है और तुम मेहमान बनसकते हो। लेकिन यह तभी संभव है जब तुम्हारे पास हृदय हो और जो दमित कामुकता के कारण सिकुड़ नहीं गया हो, जो हर तरह के विकारों से उबल नहीं रहा हो, जो कि प्राकृतिक है, जैसे कि वृक्ष; जो इतना निर्दोष है जितना कि एक बच्चा। तब आत्मीयता का कोई भय नहीं होगा।
विश्रांत होओ और समाज ने तुम्हारे भीतर जो विभाजन पैदा करदिया है उसे समाप्त कर दो। वही कहो जो तुम कहना चाहते हो। बिना फल की चिंता किए अपनी सहजता के द्वारा कर्म करो। यह छोटा सा जीवन है और इसे यहां और वहां के फलों की चिंता करके नष्ट नहीं किया जाना चाहिए।
आत्मीयता के द्वारा, प्रेम के द्वारा, दूसरें लोगों के प्रति खुल कर, तुम समृद्ध होते हो। और यदि तुम बहुत सारे लोगों के साथ गहन प्रेम में, गहन मित्रता में, गहन आत्मीयता में जी सको तो तुमने जीवन सही ढंग से जीया, और जहां कहीं तुम हो…तुमने कला सीख ली; तुम वहां भी प्रसन्नतापूर्वक जीओगे।
लेकिन इसके पहले कि तुम आत्मीयताके प्रति भयरहित होओ, तुम्हें सारे कचरे से मुक्त होना होगा जोधर्म तुम्हारे ऊपर डालते रहे हैं, सारा कबाड़ जो सदियों से तुम्हें दिया जाता रहा है। इस सबसे मुक्त होओ, और शांति, मौन, आनंद, गीत और नृत्य का जीवन जीओ। और तुम रूपांतरित होओगे…जहां कहीं तुम हो, वह स्थान स्वर्ग हो जाएगा।
अपने प्रेम को उत्सवपूर्ण बनाओ, इसे भागते दौडते किया हुआ कृत्य मत बनाओ। नाचो, गाओ, संगीत बजाओ-और सेक्स को मानसिक मत होनेदो। मानसिक सेक्स प्रामाणिक नहीं होता है; सेक्स सहज होना चाहिए।
माहौल बनाओ। तुम्हारा सोने का कमरा ऐसा होना चाहिए जैसे कि मंदिर हो। अपने सोने के कमरे मेंऔर कुछ मत करो; गाओ और नाचो और खेलो, और यदि स्वतः प्रेम होता है, सहज घटना की तरह, तो तुम अत्यधिक आश्चर्यचकित होओगे कि जीवन ने तुम्हें ध्यान की झलक देदी।
पुरुष और स्त्री के बीच रिश्ते में बहुत बड़ी क्रांति आने वाली है। पूरी दुनिया में विकसित देशों में ऐसे संस्थान हैं जो सिखाते हैं कि प्रेम कैसे करना। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जानवर भी जानते हैं कि प्रेम कैसे करना,और आदमी को सीखना पड़ता है। और उनके सिखाने में बुनियादी बात हैसंभोग के पहले की क्रीडा और उसकेबाद की क्रीडा, फोरप्ले और ऑफ्टरप्ले। तब प्रेम पावन अनुभव हो जाता है।
इसमें क्या बुरा है यदि आदमी उत्तेजित हो जाए और कमरे से बाहरनंगा निकाल आए? दरवाजे को बंद रखो! सारे पड़ोसियों को जान लेनेदो कि यह आदमी पागल है। लेकिन तुम्हें अपने चरमोत्कर्ष के अनुभव की संभावना को नियंत्रित नहीं करना है। चरमोत्कर्ष का अनुभव मिलने और मिटने का अनुभव है, अहंकारविहीनता, मनविहीनता, समयविहीनता का अनुभव है।
इसी कारण लोग कंपते हुए जीते हैं। भला वो छिपाएं; वे इसे ढंक लें, वे किसी को नहीं बताएं, लेकिन वे भय में जीते हैं। यही कारण है कि लोग किसी के साथ आत्मीय होने से डरते हैं। भय यह है कि हो सकता है कि यदि तुमने किसी को बहुत करीब आने दिया तो दूसरा तुम्हारे भीतर के काले धब्बे देख ना ले ।
इंटीमेसी (आत्मीयता) शब्द लातीन मूल के इंटीमम से आया है। इंटीममका अर्थ होता है तुम्हारी अंतरंगता, तुम्हारा अंतरतम केंद्र। जब तक कि वहां कुछ न हो, तुम किसी के साथ आत्मीय नहीं हो सकते। तुम किसी को आत्मीय नहीं होने देते क्योंकि वह सब-कुछ देखलेगा, घाव और बाहर बहता हुआ पस। वह यह जान लेगा कि तुम यह नहीं जानते कि तुम हो कौन, कि तुम पागलआदमी हा; कि तुम नहीं जानते कि तुम कहां जा रहे हो कि तुमने अपना स्वयं का गीत ही नहीं सुना कि तुम्हारा जीवन अव्यवस्थित है,यह आनंद नहीं है। इसी कारण आत्मीयता का भय है। प्रेमी भी शायद ही कभी आत्मीय होते हैं। औरसिर्फ सेक्स के तल पर किसी से मिलना आत्मीयता नहीं है। ऐंद्रिय चरमोत्कर्ष आत्मीयता नहीं है। यह तो इसकी सिर्फ परिधिहै; आत्मीयता इसके साथ भी हो सकती है और इसके बगैर भी हो सकती है। ”
ஜ۩۞۩ஜ ॐॐॐ ओशो ॐॐॐ ஜ۩۞۩ஜ
~ दि हिडन स्पलेंडर

” शरीर और मन दो अलग चीजें नहीं हैं। ” ~ ओशो : –

” शरीर और मन दो अलग चीजें नहीं हैं। ” ~ ओशो : –
” योग का कहना है कि हमारे भीतर शरीर और मन, ऐसी दो चीजें नहीं हैं। हमारे भीतर चेतन और अचेतन, ऐसी दो चीजें नहीं हैं। हमारे भीतर एक ही अस्तित्व है, जिसके येदो छोर हैं। और इसलिए किसी भी छोर से प्रभावित किया जा सकता है।
तिब्बत में एक प्रयोग है, जिसका नाम हीट-योग है, उष्णता का योग। वह तिब्बत में सैकड़ों फकीर हैं ऐसे जो नंगे बर्फ पर बैठे रह सकते हैं और उनके शरीर से पसीना चूता रहता है। इस सबकी वैज्ञानिकजांच-परख हो चुकी है। इस सबकी डाक्टरी जांच-परख हो चुकी है। औरचिकित्सक बड़ी मुश्किल में पड़ गए हैं कि यह क्या हो रहा है? एक आदमी बर्फ पर बैठा है नंगा, चारोंतरफ बर्फ पड़ रही है, बर्फीली हवाएं बह रही हैं, और उसके शरीर पर पसीना बह रहा है! क्या हुआ है इसको? यह आदमी योग के सूत्र का प्रयोग कर रहा है। इसने मन से मानने से इनकार कर दिया कि बर्फ पड़ रही है। यह आंख बंद करके यह कह रहा है, बर्फ नहीं पड़ रही है।यह आंख बंद करके कह रहा है कि सूरज तपा है और धूप बरस रही है। और यह आदमी आंख बंद करके कह रहा है कि मैं गरमी से तड़पा जा रहा हूं। शरीर उसका अनुसरण कर रहा है,वह पसीना छोड़ रहा है।
दक्षिण में एक योगी थे—ब्रह्मयोगी। उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी, रंगून यूनिवर्सिटी और आक्सफोर्ड, तीनों जगह कुछ प्रयोग करके दिखाया। वे किसी भी तरह का जहर पी लेते थे और आधा घंटे के भीतर उस जहर को शरीर के बाहर पेशाब से निकाल देते थे। किसी भी तरह का जहर उनके खून में कभी मिश्रित नहीं होता था। सब तरह के एक्सरे परीक्षण हुए। और मुश्किल में पड़गई बात कि क्या मामला है? और वह आदमी इतना ही कहता था कि मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि मैं मन को कहता हूं कि मैं स्वीकार नहींकरूंगा जहर। बस इतना मेरा अभ्यासहै।
लेकिन रंगून यूनिवर्सिटी में प्रयोग करने के बाद वे मर गए, जहरखून में पहुंच गया। आधा घंटे तक ही उनका संकल्प काम कर पाता था। इसलिए आधा घंटे के पहले जहर को शरीर के बाहर कर देना जरूरी था। आधा घंटे के बाद उनको भी शक होने लगता था कि कहीं जहर मिल ही न जाए। आधा घंटे तक वे अपने संकल्पको मजबूत रख पाते थे। आधा घंटे के बाद शक उनको भी पकड़ने लगता था कि कहीं जहर मिल न जाए। शक बड़ी अजीब चीज है। जो आदमी आधा घंटे तक जहर को अपने खून से दूर रखे, उसको भी पकड़ जाता है कि कहीं पकड़ न जाए जहर।
वे रंगून यूनिवर्सिटी से, जहां ठहरे थे वहां के लिए कार से निकले, और कार बीच में खराब हो गईऔर वे अपने स्थान पर तीस मिनट की बजाय पैंतालीस मिनट में पहुंच पाए, लेकिन बेहोश पहुंचे। वे पंद्रह मिनट उनकी मृत्यु का कारणबने।
सैकड़ों योगियों ने खून की गति पर नियंत्रण घोषित किया है। कहींसे भी कोई भी वेन काट दी जाए, खून उनकी आज्ञा से बहेगा या बंद होगा।
यह तो आप भी छोटा-मोटा प्रयोग करें तो बहुत अच्छा होगा। अपनी नाड़ी को गिन लें। और गिनने के बाद पांच मिनट बैठ जाएं और मन में सिर्फ इतना सोचते रहें कि मेरी नाड़ी की रफ्तार तेज हो रहीहै, तेज हो रही है, तेज हो रही है।और पांच मिनट बाद फिर नाड़ी को गिनें। तो आप पाएंगे, रफ्तार तेज हो गई है। कम भी हो सकती है। लंबाप्रयोग करें तो बंद भी हो सकती है। हृदय की धड़कन भी, अति सूक्ष्मतम हिस्से तक बंद की जा सकेगी, खून की गति भी बंद की जा सकेगी। शरीर और मन, ऐसी दो चीजें नहीं हैं; शरीर और मन एक ही चीज का विस्तार हैं, एक ही चीज के अलग-अलग वेवलेंथ हैं। चेतन और अचेतन एक का ही विस्तार हैं।
योग के सारे के सारे प्रयोग इस सूत्र पर खड़े हैं। इसलिए योग मानता है, कहीं से भी शुरू किया जा सकता है। शरीर से भी शुरू की जा सकती है यात्रा और मन से भी शुरू की जा सकती है। बीमारी भी, स्वास्थ्य भी, सौंदर्य भी, शक्ति भी, उम्र भी—शरीर से भी प्रभावित होती है, मन से भी प्रभावित होती है।
बर्नार्ड शा लंदन से कोई बीस मीलदूर एक गांव को चुना था अपनी कब्र बनाने के लिए। और मरने के कुछ दिन पहले उस गांव में जाकर रहने लगा। उसके मित्रों ने कहा कि कारण क्या है इस गांव को चुनने का? तो बर्नार्ड शा ने कहा, इस गांव को चुनने का एक बहुतअजीब कारण है। बताऊं तो तुम हंसोगे। लेकिन फिर कोई हर्ज नहीं, तुम हंसना, मैं तुम्हें कारण बताता हूं। ऐसे ही एक दिन इस गांव में घूमने आया था। इस गांव के कब्रिस्तान पर घूमने गयाथा। वहां एक कब्र पर मैंने एक पत्थर लगा देखा। उसको देख कर मैंने तय किया कि इस गांव में रहना चाहिए। उस पत्थर पर लिखा था—किसी आदमी की मौत का पत्थर था—लिखा था: यह आदमी सोलह सौ दसमें पैदा हुआ और सत्रह सौ दस में बहुत कम उम्र में मर गया। तो बर्नार्ड शा ने कहा कि जिस गांव के लोग सौ वर्ष को कम उम्र मानते हैं, अगर ज्यादा जीना हो तो उसी गांव में रहना चाहिए। यह तो उसकामजाक ही था, लेकिन बर्नार्ड शा काफी उम्र तक जीया भी। उस गांव की वजह से जीया, यह तो कहना मुश्किल है। लेकिन उस पत्थर को बर्नार्ड शा ने चुना, यह तो उसके मन का चुनाव है, यह ज्यादा जीने की आकांक्षा का हिस्सा तो है ही।यह हिस्सा उसके ज्यादा जीने में कारण बन सकता है।
जिन मुल्कों में उम्र कम है, उन मुल्कों में सभी लोग कम उम्र की वजह से मर जाते हैं, ऐसा सोचना जरूरी नहीं है। उन मुल्कों में कम उम्र होने की वजह से हमारी उम्र की अपेक्षाएं भी कम हो जातीहैं। हम जल्दी बूढ़े होने लगते हैं, हम जल्दी मरने का विचार करनेलगते हैं, हम जल्दी तय करते हैं कि अब वक्त आ गया। जिन मुल्कों में उम्र की अपेक्षाएं ज्यादा हैं, उनमें जल्दी कोई तय नहीं करता, क्योंकि अभी वक्त आया नहीं। तो मरने का खयाल अगर जल्दीप्रवेश कर जाए तो जल्दी परिणाम आने शुरू हो जाएंगे। मन मरने को राजी हो गया। अगर मन मरने को राजी न हो तो देर तक लंबाया जा सकता है। ”
ஜ۩۞۩ஜ ॐॐॐ ओशो ॐॐॐ ஜ۩۞۩ஜ
~ योग नये आयाम # 1

” निष्क्रिय ध्यान विधी : श्वास को देखना ” ~ ओशो : –

” निष्क्रिय ध्यान विधी : श्वास को देखना ” ~ ओशो : –
” श्वास को देखना एक ऐसी विधि है जिसका प्रयोग कहीं भी, किसी भी समय किया जा सकता है, तब भी जब आप के पास केवल कुछ मिनटों का समय हो। आती जाती श्वास के साथ आपको केवल छाती या पेट के उतार-चढ़ाव के प्रति सजग होना है। या फिर इस विधि को आजमायें : –
# प्रथम चरण: भीतर जाती श्वास कोदेखना : –
” अपनी आंखें बंद करें अपने श्वास पर ध्यान दें। पहले श्वास के भीतर आने पर, जहां से यह आपके नासापुटों में प्रवेश करता है, फिर आपके फेफड़ों तक। ”
# दूसरा चरण: इससे आगे आने वाले अंतराल पर ध्यान : –
” श्वास के भीतर आने के तथा बाहर जाने के बीच एक अंतराल आता है। यह अत्यंत मूल्यवान है। इस अंतराल को देखें। ”
# तीसरा चरण: बाहर जाती श्वास परध्यान : –
” अब प्रश्वास को देखें ”
# चौथा चरण: इससे आगे आने वाले अंतराल पर ध्यान : –
” प्रश्वास के अंत में दूसरा अंतराल आता है: उस अंतराल को देखें। इन चारों चरणों को दो से तीन बार दोहरायें- श्वसन-क्रिया के चक्र को देखते हुए, इसे किसी भी तरह बदलने के प्रयास के बिना, बस केवल नैसर्गिक लय के साथ। ”
# पांचवां चरण: श्वासों में गिनती : –
” अब गिनना प्रारंभ करें: भीतर जाती श्वास – गिनें, एक (प्रश्वासको न गिनें) भीतर जाती श्वास – दो; और ऐसे ही गिनते जायें दस तक।फिर दस से एक तक गिनें। कई बार आपश्वास को देखना भूल सकते हैं या दस से अधिक गिन सकते हैं। फिर एक से गिनना शुरू करें।
# इन दो बातों का ध्यान रखना होगा: सजग रहना, विशेषतया श्वास की शुरुआत व अंत के बीच के अंतराल के प्रति। उस अंतराल का अनुभव हैं आप, आपका अंतरतम केंद्र, आपका अंतस। और दूसरी बात:गिनते जायें परंतु दस से अधिक नहीं; फिर एक पर लौट आयें; और केवल भीतर जाती श्वास को ही गिनें।
इनसे सजगता बढ़ने में सहायता मिलती है। आपको सजग रहना होगा नहीं तो आप बाहर जाती श्वास को गिनने लगेंगे या फिर दस से ऊपर निकल जायेंगे।
यदि आपको यह ध्यान विधि पसंद आतीहै तो इसे जारी रखें। यह बहुमूल्य है।…..”
ஜ۩۞۩ஜ ॐॐॐ ओशो ॐॐॐ ஜ۩۞۩ஜ

” मेरा क्‍या काम है ? ” ~ ओशो : –

” मेरा क्‍या काम है ? ” ~ ओशो : –
” तुम पूछते हो, मेरा क्‍या काम है। मेरा काम एक ही: तुम्‍हारा नशा तोड़ना है। और तुम्‍हारा यह नशा टूट जाए तो तुम्‍हें उस नशे की तरफ ले चलना है, जो पीओ एक बार तो फिर टूटता ही नहीं।
अभी तुम बहुत तरह के नशों में जी रहे हो—धन के नशे में, पद के नशे में, प्रतिष्‍ठ के नशे में, ये सब नशे छोड़ देने है। और एक नशा पी लेना है—ध्‍यान का, समाधि का, एक शराब समाधि की। और एक घूँट काफी है। एक घूँट सागर के बराबर है। एक घूँट पिया कि नशा कभी उतरता ही नहीं। और नशा भी ऐसा नशा कि बेहोशी भी आती है और होश भी आता है। साथ-साथ आते है। युगपत आते है। एक तरफ बेहोशी। और तभी मजा है। जब बेहोशी के बीच होश का दिया जलता हे। जब तुम नाचते भी हो मस्‍ती में और भीतर कोई ठहरा भी होता है। जब बाहर तो तुम्‍हारा नृत्‍यमीरा को होता है और भीतर तुम्‍हारा ठहराव बुद्ध का होता है-–तब मजा है। तब जिंदगी आनंद है, तब जीवन उत्‍सव है।
मेरी दृष्‍टि में, उस क्षण ही अनुभव होता है कि परमात्‍मा है। उसके पहले लाख मानों मानने से कुछ भी नहीं होता है। और जिसने जाना उसके जीवन में सौभाग्‍य की घड़ी आ गई।
जो मेरे पास इक्कट्ठे है, उनको पुराने नशे से अलग करना है ओर नये नशा दे देना है। यह भी कोई काम नहीं। यह भी मेरी मौज, यह भी मेरा मजा,यह भी मेरी मस्‍ती। इसलिए किसी का नशा टूट जाये तो ठीक; न टूटे तो मैं नाराज नहीं। टूट जाए तो शुभ : न टूटे उसकी मर्जी। ”
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” मेरा स्वर्णिम बचपन : ‘झूठा ब्रह्मज्ञान’ ” : –

” मेरा स्वर्णिम बचपन : ‘झूठा ब्रह्मज्ञान’ ” : –
” झूठा ब्रह्मज्ञान- मैं जब छोटाथा तो मेरे गांव में एक बहुत बड़े विद्धवान पंडित रहते थे। वहमेरे पिता के मित्र थे। मैं अपनेपिता के उलटे सीधे प्रश्‍न पूछ कर सर खाता रहता था। पर मेरे पिता ईमानदार आदमी थे। जब वह किसी प्रश्‍न का उत्तर न दे पातेतो कह देते मुझे मालूम नहीं है। आप मेरे मित्र इन पंडित से कोई भी प्रश्न पूछ सकते है। यह ज्ञानी ही नहीं बह्म ज्ञानी भी है।
मेरे पिता की इस ईमानदारी के कारण उनके प्रति अपार श्रद्धा है। मैं पंडित जी के पास गया। उन पंडितजी के प्रति मेरे मन कोई श्रद्धा कभी पैदा नहीं हुई। क्‍योंकि मुझे दिखता ही नहीं था कि जो वह है उसमें जरा भी सच्‍चाई है। उनके घर जाकर बैठ करमैं उनका निरीक्षण भी किया करता था। वह जो कहते थे उससे उनके जीवन में कोई ताल मेल भी है या सबउपरी बातें है।
लेकिन वह करते थे बहुत ब्रह्म ज्ञान की बातें। ब्रह्मा सूत्र पर भाष्‍य करते थे। और मैं जब उनसे ज्‍यादा विवाद करता तो वह कहते, ठहरो; जब तुम बड़े हो जाओगे, उम्र पाओगे, तब यह बात समझमें आएगी। मैंने कहा: आप उम्र की एक तारीख तय कर दें। अगर आप जीवित रहे तो मैं निवेदन करूंगा उस दिन आकर। मुझे टालने के लिए उन्‍होंने कह दिया होगा—कम से कम इक्कीस साल के हो जाओ।
जब मैं इक्‍कीस साल का हो गया। मैं पहुंचा उनके पास। मैंने कहा, कुछ भी मुझे अनुभव नहीं हो रहा जो आप बताते है। इक्‍कीस साल का हो गया। अब क्‍या इरादा है? अब कहिएगा बयालीस साल के हो जाओ। बयालीस साल का जब हो जाऊँगा तब कहना चौरासी साल के हो जाओ। बात को टालो मत। तुम्‍हें हुआ हो ता कहो कि हुआ है;नहीं हुआ हो तो कहोनहीं हुआ। उस दिन न जाने वह कैसी भाव दशा में थे। कोई और भक्‍त उनका था भी नहीं। नहीं तो उन के भक्‍त उन्‍हें हमेशा घेरे बैठे रहते थे। भक्तों के सामने और भी कठिन हो जाता। उस दिन उन्‍होंने आंखे बंद कर ली। उनकी आंखों में दो आंसू गिर पड़े। उस दिन मेरे मन में उनके प्रति श्रद्धा पैदा हुई।
उन्‍होंने कहा मुझे क्षमा करो, मैं झूठ ही बोल रहा था। मुझे भी कहां हुआ है। टालने की ही बात थी। उस दिन भी तुम छोटे थे लेकिन तुम पहचान गए थे। क्‍योंकि मैं तुम्‍हारी आंखों से देख रहा था। तुम्‍हारे मन में श्रद्धा पैदा नहीं हुई थी। तुम भी समझ गए थे। मैं टाल रहा हूं, कि बड़े हो जाओ।मुझे भी पता नहीं है। उम्र से इसका क्‍या संबंध। सिर्फ झंझट मिटाने को मैंने कहा था। मैंने कहा आज मेरे मन में आपके प्रति श्रद्धा भाव पैदा हुआ। अब तक मैंआपको निपट बेईमान समझता था। ”
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~ स्वर्णिम बचपन

” जाग्रत करें स्वयं का विवेक ~ ओशो “

” जाग्रत करें स्वयं का विवेक ~ ओशो ”
” एक दिन मैं सुबह-सुबह उठकर बैठा ही था कि कुछ लोग आ गए। उन्होंने मुझसे कहा- ‘आपके संबंधमें कुछ व्यक्ति आलोचना करते हैं। कोई कहता है कि आप नास्तिक हैं। कोई कहता है अधार्मिक। आप इन सब व्यर्थ बातों का उत्तर क्यों नहीं देते?’ मैंने कहा ‘जो व्यर्थ बात है, उसका उत्तर देने का सवाल ही कहाँ है? क्या उत्तर देने योग्य मानकर हम स्वयं ही उसे सार्थक नहीं मान लेते हैं?’
यह सुनकर उनमें से एक ने कहा ‘लेकिन लोक में गलत बात चलने देनाभी ठीक नहीं।’ मैंने कहा ‘ठीक कहते हैं, लेकिन जिन्हें आलोचना ही करना है, निंदा करना है, उन्हें रोकना भी संभव नहीं हुआ है। वे बड़े आविष्कारक होते हैं और सदा ही नए मार्ग निकाल लेते हैं। इस संबंध में मैं आपको कथा सुनाता हूँ।’ और जो कथा मैंने उनसे कही, वही मैं आपसे भी कहता हूँ।
पूर्णिमा की रात्रि थी शुभ्र ज्योत्सना में सारी पृथ्वी डूबी हुई थी। शंकर और पार्वती भी अपनेप्यारे नंदी पर सवार होकर भ्रमण पर निकले हुए थे किंतु वे जैसे ही थोड़े आगे गए थे कुछ लोग उन्हें मार्ग में मिले। उन्हें नंदी पर बैठे देखकर उन लोगों ने कहा ‘देखो तो इनके बैल में जान में जान नहीं है और दो-दो उस पर चढ़कर बैठे हैं।’
उनकी बात सुनकर पार्वती नीचे उतरगईं और पैदल चलने लगीं किंतु थोड़ी दूर चलने के बाद फिर कुछ लोग मिले। वे बोले ‘अरे मजा तो देखो सुकुमार अबला को पैदल चलाकरयह कौन बैल पर बैठा जा रहा है भाई! बेशर्मी की भी हद है!’ यह सुनकर शंकर नीचे उतर आए और पार्वती को नंदी पर बैठा दिया, लेकिन कुछ ही कदम गए होंगे कि फिर कुछ लोगों ने कहा ‘कैसी बेहयाऔरत है कि पति को पैदल चलाकर खुद बैल पर बैठी है। मित्रों कलयुग आगया है।’
ऐसी स्थि‍ति देखकर आखिर दोनों हीनंदी के साथ पैदल चलने लगे किंतुथोड़ी ही दूर न जा पाए होंगे कि लोगों ने कहा ‘देखो मूर्खों को। इतना तगड़ा बैल साथ में है और ये पैदल चल रहे हैं।’ अब तो बड़ी कठिनाई हो गई। शंकर और पार्वती को कुछ भी करने को शेष न रहा।
नंदी को एक वृक्ष के नीचे रोककर वे विचार करने लगे। अब तक नंदी चुप था। अब हँसा और बोला ‘एक रास्ता है, मैं बताऊँ? अब आप दोनों मुझे अपने सिरों पर उठा लीजिए।’ यह सुनते ही शंकर और पार्वती को होश आया और दोनों नंदी पर सवार हो गए। लोग फिर भी कुछ न कुछ कहते निकलते रहे।
असल में लोग बिना कुछ कहे निकल भी कैसे सकते हैं? अब शंकर और पार्वती चाँदनी की सैर का आनंद लूट रहे थे और भूल गए थे कि मार्गपर अन्य लोग भी निकल रहे हैं।
जीवन में यदि कहीं पहुँचना हो तोराह में मिलने वाले प्रत्येक व्यक्ति की बात पर ध्यान देना आत्मघातक है। वस्तुत: जिस व्यक्ति की सलाह का कोई मू्ल्य है, वह कभी बिना माँगे सलाह देता ही नहीं है। और यह भी ‍स्मरण रहे कि जो स्वयं के विवेक से नहीं चलता है, उसकी गति हवा के झोकों में उड़ते सूखे पत्तों की भाँति हो जाती है। ”
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साभार : मिट्टी के दीये
सौजन्य : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन